संघ शिक्षा वर्ग का उद्देश्य
आवश्यकता :
संघ ने हिन्दू समाज को संस्कारित कर संगठित करने का कार्य अपने हाथ में लिया है। इस हेतु नियमित शाखा को-साधन के रूप में अपनाया गया।
शाखा अर्थात कार्यक्रम यानि कार्यकर्त्ता का निर्माण कार्यकर्त्ताओं के सर्वागीण विकास हेतु संघ शिक्षा ।
मानसिकता का विकास :
संघ शिक्षा वर्ग मनोरंजन स्थली नहीं वरन् योग्य कार्यकर्त्ता बनने हेतु तपस्या स्थली ।
स्वयं की प्रेरणा से शिक्षा वर्ग में जाने का मानस बनना चाहिए।
वर्ग में अधिकाधिक कष्टों को सहते हुए भी योग्य प्रशिक्षण प्राप्त करना चाहिए।
एक-एक पल का समुचित उपयोग हो ।
शारीरिक क्षमता का विकास :
स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन का निवास ।
व्यक्तिशः चुस्ती-फुर्ती, धैर्य, क्षमता व प्रभावी व्यक्तित्व विकास के लिए।
संघ शिक्षा वर्ग के शारीरिक कार्यक्रमों का अत्याधिक योगदान।
सामूहिक सहयोग तथा अनुशासन का निर्माण ।
बौद्धिक विकास :
बौद्धिक, चर्चा, बैठक आदि के माध्यम से संघ की विचारधारा को सही रूप में समझना व अधिकाधिक योग्यता अर्जित करने की पात्रता विकसित करना।
जिससे अपनी विचारधारा को फैलानेकी योग्यता, शंका-समाधान, संतुलित उत्तर देने की क्षमता व अन्य बंधुओं को समझाने की क्षमता का विकास हो सके।
भावनात्मक विकास :
संघ के प्रति अपनत्व, स्वजनों, स्वदेश, स्वसंस्कृति, स्वधर्म, स्व इतिहास व महापुरुषों के प्रति उत्कृष्ट प्रेम व भक्ति भावना का विकास।
बन्धुओं के प्रति अनुराग पूर्ण भ्रातृत्व व स्नेह, साथियों से निश्छल मैत्री भाव व बड़े अधिकारियों के प्रति स्वाभाविक परिवार सुलभ आदर व श्रद्धा का निर्माण ।
संस्कारित वातावरण का निर्माण :
स्वाभाविक समाज जीवन का स्वस्थ अंग बनने की सिद्धता का निर्माण, विधिनिषेधों की अनुभूति, उत्तम कार्यकर्ताओं से सपर्क संघ की विराट शक्ति व राष्ट्र के लघुरूप की अनुभूति होती है। जिससे संस्कारित वातावरण बनाने में सहायता मिलती है ।
संगठन की दृष्टि से उपयोगी :
नये कार्यकर्ताओं का निर्माण, पुराने कार्यकर्त्ताओं का कार्य अभ्यास तथा शिथिल साथियों में नवचैतन्य संचार सामूहिक योजनाओं को क्रियान्वित करने की क्षमता का विकास।