राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ (RSS) प्रार्थना

राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ (RSS) प्रार्थना 

प्रार्थना का विकास क्रमः~

संघ में प्रचलित वर्तमान प्रार्थना व आज्ञायें ,घोष रचनाएं ,गणवेश आदि संघ के प्रारम्भ से ऐसी नहीं थी। समय-समय पर आवश्कतानुसार उनमें परिवर्तन होता रहा है, जैसे 2016 की विजय दशमी में गणवेश में परिवर्तन हुआ है, जिसमें निक्कर के स्थान पैंट और मोज़े का हुआ है। संघ जैसे विकासशील और गतिमान संघठन के लिए उसकी संरचनाओं का लचीलापन और देश-काल और परिस्थिति के अनुसार उनमें योग्य परिवर्तन करने की संघ की सिद्धता उसकी शक्ति सिद्ध हुई है। प्रारम्भ में (1926) में शाखा के शारीरिक व बौद्धिक कार्यक्रमों के बाद जो प्रार्थना बोली जाती थी, उसमे एक पद मराठी व एक पद हिंदी का था। मराठी पद उन दिनों महाराष्ट्र की अनेक प्राथमिक विद्यालयों व व्यायामशालाओं में बोली जाने वाली एक प्रमुख वन्दना थी तथा हिन्दी पद उत्तर भारत में गाई जाने वाली प्रमुख वन्दना। इसी वन्दना में कुछ आवश्यक परिवर्तन करके प्रार्थना का तत्कालीन प्रार्थना से आवश्यक पदों को संघ की प्रार्थना के लिए चुना गया। तत्कालीन प्रार्थना के अन्त में छत्रपति शिवाजी महाराज के प्रेरणा स्रोत्र श्री समर्थ रामदास स्वामी जी का जयघोष बोला जाता था।

मराठी 

“नमो मातृभूमि जिथे जन्मलो मी ।
नमो आर्यभूमि जिथे वाढलो मी ।।
नमो धर्मभूमि जियेच्याच कामी ।
पड़ो देह माझा सदा ती नमीमी ।।”

हिन्दी

“हे गुरु श्री रामदूता,शील हमको दीजिये,
शीघ्र सारे दुर्गुणों से,मुक्त हमको कीजिये।।
लीजिये हमको शरण में,राम पन्थी हम बनें,
ब्रह्मचारी धर्म रक्षक,वीरव्रत धारी बनें ।।
“राष्ट्र गुरु श्री समर्थ रामदास स्वामी की जय!”


तत्कालीन समय में संघ कार्य विधर्भ प्रान्त तक ही सीमित था किन्तु जैसे-जैसे संघ कार्य का विस्तार संपूर्ण भारतवर्ष में फैलने लगा, तो प्रार्थना की भाषा में परिवर्तन का अनुभव होने लगा। संघ की प्रार्थना की रचना व प्रारूप सर्वप्रथम फरवरी 1939 में नागपुर के पास सिन्दी में हुई बैठक में तैयार किया गया। प्रार्थना बैठक में संघ के आद्य सरसंघचालक प.पू.डाँ केशव बलिराम हेडगेवार जी, द्वितीय सरसंघचालक प.पू.श्री गुरु जी, श्री तात्याराव तैलंग, माननीय श्री बाबासाहब आप्टे, श्री विट्ठलराव पतकी, श्री बाबाजी सालोडकर, श्री कृष्णराव मोहरीर, श्री नाना साहब टालाटूले, श्री नरहरि नारायण भीड़े आदि कई स्वयंसेवक सहभागी थे। इसी बैठक में विचारविमश कर सर्वसम्मति से यह निर्णय हुआ की अब प्रार्थना को उस भाषा में होना चाहिए जो समस्त समाज व सम्पूर्ण भारतवर्ष में स्वीकार्य हो। इसी बैठक में संस्कृत भाषा में प्रार्थना का ऐतिहासिक निर्णय हुआ, क्योंकि संस्कृत भाषा समस्त भारतीय भाषाओं की जननी तथा राष्ट्र को एक सूत्र में जोड़ने वाली है और समस्त हिन्दु समाज को स्वीकार्य है। अब प्रार्थना का गद्य और पद्य प्रारूप का दायित्व क्रमसः नाना साहब टालटुले व श्री नरहरि नारायण भिड़े जी को दिया गया। इस प्रार्थना में संघ का लक्ष्य, लक्ष्य प्राप्ति का मार्ग, लक्ष्य प्राप्ति के लिए आवश्यक गुण, संघ के अधिष्ठान, संकल्प आदि सभी कुछ को समाहित किया गया। प्रार्थना के अन्त में भारत माता की जय हिन्दी में रखा गया।

इस प्रार्थना की रचना श्री नरहरि नारायण भिड़े ने फरवरी १९३९ (1939) में की थी। इसे सर्वप्रथम २३ अप्रैल १९४० (1940) को पुणे के संघ शिक्षा वर्ग में गाया गया था। शास्त्रीय संगीत के मुर्धन्य संगीतज्ञ माननीय श्री यादव राव जोशी ने इसे सुर प्रदान किया था। इस प्रार्थना में पूर्व प्रार्थना के सभी महत्वपूर्ण भावों का समावेश तो किया ही गया, साथ ही उसमे कुछ और अभीष्ट भावों को भी समाविष्ट कर उसे और अधिक समृद्ध किया गया, प्रार्थना संघ का मंत्र है। संघ का सिद्धांत, उद्देश्य, कार्यपद्धति आदि विभिन्न बातों का समावेश सूत्र रूप में किया गया है। अतः प्रत्येक स्वयंसेवक को प्रार्थना कण्ठस्थ उसके स्वर, उच्चारण, शब्दार्थ और भावार्थ आदि का सम्यक ज्ञान आवश्यक है।  प्रार्थना मात्र पुरुषार्थवादी है, इसलिए कार्य हम करेंगे, प्रयास हम करेंगे न की भगवान, किन्तु उन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक गुणों की पूर्ति भगवान से मांगी गयी है ऐसा जानना चाहिए।


संघ की प्रार्थना में 3 श्लोक व 1 उद्घोष मिलाकर 13 पंक्तियां हैं। संघ की इस प्रार्थना को संघ की शाखा अथवा संघ के अन्य कार्यक्रमों में अनिवार्य रूप से गाया व दोहराया जाता हैं। प्रार्थना के प्रथम श्लोक का वृत्त ‘भुजंगप्रयात’ है। उसकी प्रत्येक पंक्ति में बारह अक्षर हैं। दूसरे और तीसरे श्लोक का वृत्त है ‘मेघनिर्घोष’। उसकी प्रत्येक पंक्ति में तेईस अक्षर हैं। तेईस अक्षरों की पंक्ति बड़ी होने से हम लोग प्रत्येक पंक्ति के दो भाग करते हैं। प्रथम बारह अक्षर बोलते हैं और बाद में ग्यारह।


उच्चारण के कुछ नियम

1. संस्कृत में जब वाक्य या चरण के बीच अनुस्वार आता है तब उसका उच्चारण उसके बाद आने वाले अक्षर पर निर्भर होता है। जिस वर्ग का वह अक्षर होगा, उसी वर्ग के अनुनासिक का उच्चारण अनुस्वार ग्रहण करेगा। जैसे क, ख, ग, घ आने पर ड्, च, छ, ज, झ, आने पर झू ; ट, ठ, ड, ढ, आने पर ण ; त, थ, द, ध, न आने पर न् ; प, फ, ब, भ, म आने पर तथा पंक्ति के अंत में अनुस्वार होने पर म् का उच्चारण होगा। 

इस दृष्टि से प्रार्थना में आए कुछ पदों का उच्चारण निम्नानुसार रहेगा :-

सादरं त्वां नमामी ------ सादरन् त्वान् नमामो
शुभामाशिष देहि ------ शुभामाशिषन् देहि
अजययां च ------------- अजययाडम च
नम्र भवेत्। -------------  नम्रम् भवेत्
श्रुतं चैव ----------------  श्रुतज्ञ चैव
स्वयं स्वीकृतं न -------- स्वयवॅ स्वीकृतन् नः
परं साधन नाम -------- परवॅ साधनन् नाम
परं वैभवं नेतुम -------- परवें वैभवन् नेतुम

2. दूसरा उच्चारण है विसर्ग का। विसर्ग के आगे क, ख, या, प, फ, आया तो विसर्ग का उच्चारण क्रमश: अख्, अफ् जैसा होगा। जैसे-हूदन्तः प्रजागतु हृदन्तफ् प्रजागतु

किन्तु विसर्ग के आगे ष, श, स आए तो विसर्ग का उच्चारण भी षु, शु, स् हो जाएगा। जैसे –
नः सुगं कारयेत् ------- नस् सुगड्कारयेत्।
तदन्त्ः स्फुरत्वक्षया --- तदन्तस् स्फुरत्वक्षया
न: संहता -------------- नस् संहता
समुत्कर्ष नि:श्रेयस ---- समुत्कर्ष निश्श्रेयस्


प्रार्थना व हिन्दी अनुवाद and english translation

नमस्ते सदावत्सले मातृभूमे
त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम् ।
महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे
पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते ।।१।।

भावार्थ:
हे वत्सल मातृभूमि ! मैं तुझे निरन्तर प्रणाम करता हूँ। हे हिन्दुभूमि तूने ही मेरा सुखपूर्वक संवर्धन किया है। हे महामड्गलमयी पुण्यभूमि! तेरे लिए ही मेरी यह काया (जीवन) काम आए। मैं तुझे बारम्बार प्रणाम करता हूँ।
O Loving Motherland (Bharatmata or Mother India) ever-affectionate to your children-salutation to thee.  Oh Hindu land, I have been happily brought up by you.  Oh the supreme benefactor holy land, this body be laid down for you.  Many praises for you.


प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता इमे सादरं त्वां नमामो वयम्
त्वदीयाय कार्याय बद्धा कटीयं शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये ।
अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिं सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत्
श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्णमार्गं स्वयं स्वीकृतं नः सुगं कारयेत् ।।२।।

भावार्थ:
हे सर्वशक्तिमान् परमेश्वर! हम हिन्दुराष्ट्र के अंगभूत घटक, तुझे आदरपूर्वक प्रणाम करते हैं। तेरे ही कार्य के लिए हमने अपनी कमर कसी है। उसकी पूर्ति के लिए हमें शुभ आशीर्वाद दे। विश्व के लिए जो अजेय हो ऐसी शक्ति, सारा जगत् जिससे विनम्र हो ऐसा विशुद्ध शील तथा बुद्धिपूर्वक स्वयं स्वीकृत हमारे कण्टकमय मार्ग को सुगम करने वाला ज्ञान विवेक भी हमें दे।
Oh mighty Master, as integral parts of the Hindu nation, we respectfully bow to thee.  We have resolved (fastened our waist-belt) to perform your works.  Please give us your blessing to fulfill them.  Give us the universe's unconquerable power; (and) give us good behavior and pure character that would make the world gentle. Give us the wisdom that would make our (voluntarily-taken) thorny roads smooth.


समुत्कर्षनिःश्रेयसस्यैकमुग्रं परं साधनं नाम वीरव्रतम्
तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्रानिशम् ।
विजेत्री च नः संहता कार्यशक्ति र्विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम् ।
परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम् ।।३।।

भावार्थ:
ऐहिक और पारलौकिक कल्याण तथा मोक्ष की प्राप्ति के लिए वीरव्रत नामक जो एकमेव, श्रेष्ठ, उत्कट साधन है, उसका हमारे अन्त:करण में स्फुरण हो। हमारे हृदय में अक्षय(कभी न खत्म होने वाली) तथा तीव्र ध्येयनिष्ठा सदैव जागृत रहे। तेरे आशीर्वाद से हमारी विजयशालिनी संगठित कार्यशक्ति स्वधर्म का रक्षण कर अपने इस राष्ट्र को परम वैभव की स्थिति में ले जाने में पूर्णतया समर्थ हो।
The only supreme vigorous way to achieve earthly and after-life well-being and emancipation is the way of might - this thought be expressed in our minds.  May an unending devotion to ideology be ever-kindled in our hearts.  Our vindicated organized work for the protection of this religion (creed) through your blessings be successful to bring our rashtra (Hindu nation) to supreme glory.

।। भारत माता की जय ।।


प्रार्थना अन्वय और शब्दार्थः~

वत्सले मातृभूमि!= (हे) अपनी संतानों पर प्रेम करने वाली मातृभूमि, ते= तुझे, सदा= निरन्तर, नमः= प्रणाम, हिन्दुभूमे= हे हिन्दुभूमि, त्वया= तेरे द्वारा, अहम्= मैं, सुखम् वर्धितः= सुख में बढ़ाया गया हूँ, (वर्धितोअहम्= वर्धितः+अहम्), महामङ्गले पुण्यभूमे= हे परम मंगलमयी पूण्य भूमि!, त्वदर्थे= (त्वत्+अर्थे) तेरे लिए, एषः= यह, कायः= शरीर, पततु= अर्पित हो, (पततु+एषः), नमस्ते नमस्ते= बारम्बार नमस्कार ।।1।।

प्रभो शक्तिमन्= हे शक्तिमान प्रभो!, हिंदुराष्ट्रांगभूता= हिन्दु राष्ट्र के अंगभूत घटक, इमे= ये, वयं= हम, त्वाम्= तुझे, सादरम्= आदर सहित, नमामः= प्रणाम करते हैं, त्वदीयाय= तेरे लिए, कार्याय= कार्य हेतु, इयम्= यह, कटि= कमर, (कटियम्= कटि+इयम्), बद्धा= बाँधी है, कसी है, तत्पूर्तये= उसकी पूर्ति के लिए, शुभाम् आशिषम्= शुभ आशीर्वाद, देहि= दे, ईश= हे ईश!, विश्वस्य= विश्व के लिए, अज्य्याम्= जिसे जितना सम्भव नहीं, शक्तिम्= शक्ति, देहि= दे, येन=जिससे, जगद्= विश्व, नम्रम्= नम्र। भवेत्= हो (ऐसा), सुशीलम्= उत्तम शील, यत्= जो, स्वयम् स्वीकृतम्= अपनी प्रेरणा से स्वीकृत किया हुआ, नः= हमारे, कण्टकाकीर्णमार्गम्= कण्टकमय मार्ग को (कण्टक=काटे,कष्ट+आकीर्ण=व्याप्त), सुगम् करयेत्= सुगम करें (ऐसा), श्रुतम्= ज्ञान, चैव= तथा,भी, देहि= दे।।2।।

समुत्कर्षनिःश्रेयसस्य=समुत्कर्ष और निःश्रेयस का (समुत्कर्ष= ऐहिक और पारलौकिक कल्याण, निःश्रेयस+मोक्ष), एकम् परम् उग्रम् साधनम्= एकमात्र परम उग्र साधन(जो), वीरव्रतम् नाम= वीरव्रत नामक(है), तत्= वह,उसको, अन्तः= अन्तःकरण में, स्फुरतु= स्फुटित हो, जागृत हो, अक्षया= क्षीण न होने वाली, तीव्रा= तीव्र, ध्येयनिष्ठा= ध्येय के प्रति निष्ठा, अनिशम्= नित्य, हृदन्तः= ह्रदय में, प्रजागर्तु= जागृत रहे, विजेत्री= विजयशालिनी, च= और, व, नः= हमारी, संहता= संगठित कार्यशक्ति, अस्य= इस, धर्मस्य= धर्म का, संरक्षणम्= संरक्षण, विधाय+अस्य= करते हुए इसको, एतत्= इसको, इस, स्वराष्टम्= अपने राष्ट्र को, परम् वैभवम्= परम वैभव की स्थिति में, नेतुम्= ले जाने में, ते= तेरे, आशीषम्= आशीर्वाद से, भृशम्= अतीव, समर्था= समर्थ, भवतु= हों ।।3।।


शुद्ध उच्चारण एवम् भावार्थ

किसी भी प्रार्थना व वन्दना के प्रत्येक शब्द उनके अर्थ, भावार्थ, उच्चारण का योग्य ज्ञान जब तक सम्बंधित व्यक्ति को नहीं होगा, तब तक प्रार्थना व वन्दना का सही भाव उसमें नहीं जागेगा। एक एक शब्द व उनमें निहित भावार्थ का ज्ञान योग्य प्रकार से कराना तथा शब्दों का लेखन शुद्ध कराना। हलन्त, विसर्ग, अनुस्वार की जानकारी के अनुसार उच्चारण का ध्यान अवश्य रखना चाहिए। प्रार्थना में 3 श्लोक तथा 'भारत माता की जय', मिलकर 13 पंक्तिया हैं, दोहराते समय पंक्तियों की संख्या 21 हैं।


प्रथम श्लोक :- प्रथम श्लोक को स्वयंसेवक एक वचन में बोलता है, वह इस श्लोक में कुछ मांगता नहीं अपितु मातृभूमि के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करता है। मातृभूमि को सर्वोच्च स्थान पर रखते हुए इस मातृभूमि की विशेषताओं का स्मरण कर उसके लिए स्वयं को समर्पित करने का संकल्प लेता है। इस श्लोक के माध्यम से वह मातृभूमि (राष्ट्र) के लिए "मातृभूमे, हिन्दुभूमे, महामङ्गले, पुण्यभूमे" विशेषणों का प्रयोग करता है। इन सभी के विशेष अर्थ हैं।

"वत्सले मातृभूमे" :- अर्थात् अपने पुत्र पर मातृवत स्नेह करने वाली मातृभूमि, या पुत्र को सदैव मातृवत स्नेह देने वाली होता है। इस श्लोक में "नमस्ते सदा वत्सले" में सदा का सम्बन्ध नमस्ते के साथ है वत्सले के साथ नहीं, और मातृभूमि का परिचय अनादि काल से ही हिन्दुभूमि के रूप में है, यह समझना चाहिए।

"पतत्वेष कायो" :- मातृभूमि के प्रति अनन्य भक्तिभाव के कारण श्रद्धा पूर्वक समर्पण हेतु यह संकल्प है, जिसे स्वयंसेवक नित्यप्रति दोहराता है। "मातृभूमि के प्रति मेरा सर्वस्वार्पण हो जाये ऐसी अभिलाषा स्वयंसेवक "पतत्वेष कायो" के रूप में व्यक्त करता है। समर्पण केवल एक वचन में अर्थात् स्वयं का ही होता है। कोई दूसरा बलिदान करेगा तब मैं करूँगा या हम सब बलिदान करेंगे ऐसा नहीं है।


द्वितीय श्लोक :- यह श्लोक उत्तम पुरुष बहुवचन में है। जब हम कोई वस्तु मांगते है तब अकेले के लिए नहीं माँगते है। अतः द्वितीय श्लोक के माध्यम से हम सर्वशक्तिमान ईश्वर को सामूहिक रूप से नमस्कार करते हैं।

"वयं हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता" :- यहाँ हम अपना परिचय सामूहिक रूप से हिन्दु राष्ट्र के अभिन्न अङ्ग के रूप में करते है (राष्ट्र से एकात्मता, जो संघ का सिद्धान्त है)

"त्वदीयाय कार्याय" :- यहाँ हम सब मिलकर ईश्वर से निवेदन करते है कि, "हे प्रभु! यह कार्य आपका ही है (संघ कार्य, ईश्वरीय कार्य) हम सब आपका (ईश्वर का) कार्य करने में समर्थ हो सकें इसलिए आशीर्वाद के रूप में आप (ईश्वर) हम सबको विशेष पाँच गुण प्रदान करने की कृपा करें ऐसा इस श्लोक का भाव जानें।

स्वयं स्वीकृतं कण्टकाकीर्ण मार्गम् :- स्वयं स्वीकार किया हुआ यह मार्ग सुखमय नहीं है, अर्थात् कष्टों (चुनौतियों) से भरा यह कार्य हमने अपने मन, बुद्धि व आत्मा से स्वयं स्वीकार किया है।


मांगे गए पाँच गुण :-

  1. अजेय शक्ति - ऐसी शक्ति जिसको विश्व में कोई जीत न सके।
  2. सुशील - ऐसा श्रेष्ठ शील (चरित्र) माँगा है जिसके समक्ष सम्पूर्ण विश्व नतमस्तक हो जाये।
  3. श्रुतं - ऐसा ज्ञान भी माँगा है जो सभी कठिनाईयों तथा समस्याओं में से मार्ग प्रसस्त कर दे,तथा कभी कोई विभ्रम न हो।
  4. वीरव्रत :- विषम परिस्थितियों में भी जो धैर्य रखते हुए अपने लक्ष्य की और अग्रसर रहे वीरव्रती कहलाता है।
  5. अक्षय ध्येयनिष्ठा - जीवन में ध्येय का स्मरण और उसके प्रति निष्ठा अक्षय बनी रहे अर्थात् जीवन की अन्तिम श्वास तक इस कार्य के प्रति मेरी भावनाएं तथा मेरा समर्पण बाधित या समाप्त न हो । ऐसे आशीर्वाद के रूप में "ध्येय निष्ठा" अन्तिम गुण माँगा है।


तृतीय श्लोक :- 
समुत्कर्ष निःश्रेयस - इस लोक तथा ऊध्र्वलोक का उत्कर्ष (वैभव) तथा मोक्ष दोनों वीरव्रती को ही मिलते हैं। ऐसा वीरव्रत भी ईश्वर से माँगा है। समुत्कर्ष निःश्रेयस -ऐहिक एवं पारलौकिक कल्याण। कणाद मुनि ने धर्म की व्याख्या इस प्रकार की है - यतोSभ्यूदय निःश्रेयस् सिद्धि: स धर्म:।

संहता कार्यशक्तिर् - कार्य की पूर्णता संघठित शक्ति के आधार पर करने हैं, अर्थात् सभी कार्य संघठन के द्वारा ही करने हैं।

विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम् - अपने लक्ष्य "धर्म तथा हिन्दुत्व के रक्षण" को धर्म का रक्षण करते हुए प्राप्त करना।

परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं - यहाँ हम अपने पवित्र ध्येय का स्मरण करते हैं। परम वैभव का अर्थ है कि सभी प्रकार से हमारे राष्ट्र का उत्कर्ष हो। अपने राष्ट्र के जीवन मूल्यों तथा जीवन उद्देश्यों का सम्मान करते हुए राष्ट्र के परम वैभवशाली स्वरुप को हम प्राप्त करें।

भारत माता की जय - यह उदघोष (नारा) नहीं अपितु भारत माता की सर्वत्र जय-जयकार करने का दृढ संकल्प हम लेते हैं।


English:

namaste sadā vatsale mātṛbhūme
tvayā hindubhūme sukhaṁ vardhitoham
mahāmaṅgale puṇyabhūme tvadarthe
patatveṣa kāyo namaste namaste ||

prabho śaktiman hindurāṣṭrāṅgabhūtā
ime sādaraṁ tvāṁ namāmo vayam
tvadīyāya kāryāya badhdā kaṭīyaṁ
śubhāmāśiṣaṁ dehi tatpūrtaye
ajayyāṁ ca viśvasya dehīśa śaktiṁ
suśīlaṁ jagadyena namraṁ bhavet
śrutaṁ caiva yatkaṇṭakākīrṇa mārgaṁ
svayaṁ svīkṛtaṁ naḥ sugaṁ kārayet ||

samutkarṣaniḥśreyasyaikamugraṁ
paraṁ sādhanaṁ nāma vīravratam
tadantaḥ sphuratvakṣayā dhyeyaniṣṭhā
hṛdantaḥ prajāgartu tīvrāniśam
vijetrī ca naḥ saṁhatā kāryaśaktir
vidhāyāsya dharmasya saṁrakṣaṇam
paraṁ vaibhavaṁ netumetat svarāṣṭraṁ
samarthā bhavatvāśiśā te bhṛśam ||

bhārata mātā kī jaya


Tamil:

நமஸ்தே ஸதா வத்ஸலே மாத்ருபூமே
த்வயா ஹிந்துபூமே ஸுக(ம்) வர்த்திதோஹம்
மஹாமங்கலே புண்யபூமே த்வதர்த்தே
பதத்வேஷ காயோ நமஸ்தே நமஸ்தே

ப்ரபோ சக்திமன் ஹிந்துராஷ்ட்ராங்கபூதா
இமே ஸாதரந் த்வான் நமாமோ வயம்
த்வதீயாய கார்யாய பத்தா கடீயம்
சுபாமாசிஷந் தேஹி தத்பூர்த்தயே
அஜய்யாஞ்ச விஷ்வஸ்ய தேஹீச சக்திம்
ஸுசீலஞ் ஜகத்யேன நம்ரம் பவேத்
ஷ்ருதஞ் சைவ யத்கண்ட காகீர்ணமார்கம்
ஸ்வயம் ஸ்வீக்ருதன்நஸ் ஸுகங்காரயேத்

ஸ்முத்கர்ஷ நிஷ்ரேய ஸஸ்யைக முக்ரம்
பரம் ஸாதனன் நாம வீரவ்ரதம்
ததந்தஸ் ஸ்புரத்வக்ஷயா த்யேய நிஷ்டா
ஹ்ருதந்தஹ் ப்ரஜாகர்து தீவ்ரானிசம்
விஜேத்ரீ ச நஸ் ஸம்ஹதா கார்ய சக்திர்
விதாயாஸ்ய தர்மஸ்ய ஸம்ரக்ஷணம்
பர(ம்)வ் வைபவன் நேதுமேதத் ஸ்வராஷ்ட்ரம்
ஸமர்த்தா பவத்வா சிஷா தே ப்ருசம்

பாரத் மாதா கீ ஜய்


Telugu:

నమస్తేసదావత్సలేమాతృభూమే
త్వయాహిన్దుభూమేసుఖవ్వర్దితోహమ్
మహామ‘జ్గలేపుణ్యభూమేత్వదర్థే
మతత్వేషకాయోనమస్తేనమస్తే || ౧ ||

ప్రభోశక్తిమన్హిన్దురాష్ట్రా‘జ్గభూతా
ఇమేసాదరన్త్వాన్నమామోవయమ్
త్వదీయాయకార్యాయబద్దాకటీయమ్
శుభామాశిషన్దేహితత్పూర్తయే || ౨ ||
అజయ్యాఞ్చవిశ్వస్యదేహీశశక్తిమ్
సుశీలన్జగద్యేననమ్రమ్భవేత్
శ్రుతఞ్చైవయత్కంటకాకీర్ణమార్గమ్
స్వయమ్స్వీకృతన్నస్సుగఙ్కారయేత్ || ౩ ||

సముత్కర్షనిస్శ్రేయసస్యైకముగ్రమ్
పరమ్సాధనన్నామవీరవ్రతం
తదన్తస్స్ఫురత్వక్షయాధ్యేయనిష్ఠా
హృదన్తస్ప్రజాగర్తుతీవ్రానిశమ్ || ౪ ||
విజేత్రీచనస్సంహతాకార్యశక్తిర్
విధాయాస్యధర్మస్యసంరక్షణమ్
పరవ్వైభవన్నేతుమేతత్స్వరాష్ట్రమ్
సమర్థాభావత్వాశిషాతేభృశమ్ || ౫ ||

|| భారత్మాతకిజయ్ ||


Kannada:

ನಮಸ್ತೇ ಸದಾ ವತ್ಸಲೇ ಮಾತೃಭೂಮೇ |
ತ್ವಯಾ ಹಿಂದುಭೂಮೇ ಸುಖಂ ವರ್ಧಿತೋಹಮ್ ||
ಮಹಾಮಂಗಲೇ ಪುಣ್ಯಭೂಮೇ ತ್ವದರ್ಥೇ
ಪತತ್ವೇಷ ಕಾಯೋ ನಮಸ್ತೇ ನಮಸ್ತೇ ||೧||

ಪ್ರಭೋ ಶಕ್ತಿಮನ್ ಹಿಂದುರಾಷ್ಟ್ರಾಂಗಭೂತಾ
ಇಮೇ ಸಾದರಂ ತ್ವಾಂ ನಮಾಮೋವಯಮ್ |
ತ್ವದೀಯಾಯ ಕಾರ್ಯಾಯ ಬದ್ಧಾ ಕಟೀಯಮ್
ಶುಭಾಮಾಶಿಷಂ ದೇಹಿ ತತ್ಪೂರ್ತಯೇ ||
ಅಜಯ್ಯಾಂ ಚ ವಿಶ್ವಸ್ಯ ದೇಹೀಶ ಶಕ್ತಿಮ್
ಸುಶೀಲಂ ಜಗದ್ಯೇನ ನಮ್ರಂ ಭವೇತ್ |
ಶ್ರುತಂ ಚೈವ ಯತ್ ಕಂಟಕಾಕೀರ್ಣಮಾರ್ಗಮ್
ಸ್ವಯಂ ಸ್ವೀಕೃತಂ ನಃ ಸುಗಂ ಕಾರಯೇತ್ ||೨||

ಸಮುತ್ಕರ್ಷನನಿಃಶ್ರೇಯಸಸ್ಯೈಕಮುಗ್ರಮ್
ಪರಂ ಸಾಧನಂ ನಾಮ ವೀರವ್ರತಮ್ |
ತದಂತಃ ಸ್ಫುರತ್ವಕ್ಷಯಾ ಧ್ಯೇಯನಿಷ್ಠಾ
ಹೃದಂತಃ ಪ್ರಜಾಗರ್ತು ತೀವ್ರಾನಿಶಮ್ ||
ವಿಜೇತ್ರಿ ಚ ನಃ ಸಂಹತಾ ಕಾರ್ಯಶಕ್ತಿರ್
ವಿಧಾಯಾಸ್ಯ ಧರ್ಮಸ್ಯ ಸಂರಕ್ಷಣಮ್ |
ಪರಂ ವೈಭವಂ ನೇತುಮೇತತ್ ಸ್ವರಾಷ್ಟ್ರಮ್
ಸಮರ್ಥಾ ಭವತ್ವಾಶಿಷಾ ತೇ ಭೃಶಮ್ ||೩||

|| ಭಾರತ್ ಮಾತಾ ಕಿ ಜಯ್ ||


Malayalam:

നമസ്തേ സദാ വത്സലേ മാതൃഭൂമേ
ത്വയാ ഹിന്ദുഭൂമേ സുഖം വര്ദ്ധി തോഹം
മഹാമങ്ഗലേ പുണ്യഭൂമേ ത്വദര്ത്ഥേಮ
പതത്വേഷ കായോ നമസ്തേ നമസ്തേ

പ്രഭോ ശക്തിമൻ ഹിന്ദുരാഷ്ട്രാങ്ഗഭൂതാ:
ഇമേ സാദരം ത്വാം നമാമോ വയം
ത്വദീയായ കാര്യായ ബദ്ധാ കടീയം
ശുഭാമാശിഷന്ദേഹി തത്പൂര്ത്തയയേ
അജയ്യാഞ്ച വിശ്വസ്യ ദേഹീശ ശക്തിം
സുശീലം ജഗദ്യേന നമ്രം ഭവേത്
ശ്രുതഞ്ചൈവ യത് കണ്ടകാകീര്ണ്ണഭ മാര്ഗ്ഗം
സ്വയം സ്വീകൃതന്നസ്സുഗങ്_കാരയേത്

സമുത്കര്ഷനിഃശ്രേയസസ്വൈകമുഗ്രം
പരം സാധനം നാമ വീരവ്രതം
തദന്തസ്ഫുരത്വക്ഷയാ ധ്യേയനിഷ്ഠാ
ഹൃദന്തഃ പ്രജാഗര്ത്തു  തീവ്രാനിശം
വിജേത്രീ ച നസ്സംഹതാ കാര്യശക്തിര്‍-
വിധായാസ്യ ധർമ്മസ്യ സംരക്ഷണം
പരം വൈഭവം നേതുമേതത് സ്വരാഷ്ട്രം
സമർഥാ ഭവത്വാശിഷാ തേ ഭൃശം

ഭാരത്‌ മാതാ കീ ജയ്


Bangla

নমস্তে সদা বাত্সলে মাতৃভূমে
তৈয়া হিন্দুভূমে সুখং বার্ধিতহাম
মহামঙ্গলে পুণ্যভূমে ত্দর্থে
পতাতেয়ে স্কয় নমস্তে নমস্তে
প্রভো শক্তিমন্‌ হিন্দুরাষ্ট্রাঙ্গভূতা
ইমে সাদরং ত্঵াং নমামো ঵যম্
ত্঵দীযায কার্যায বধ্দা কটীযং
শুভামাশিষং দেহি তত্পূর্তযে
অজয্যাং চ ঵িশ্঵স্য দেহীশ শক্তিং
সুশীলং জগদ্যেন নম্রং ভ঵েত্
শ্রুতং চৈ঵ যত্কণ্টকাকীর্ণ মার্গং
স্঵যং স্঵ীকৃতং নঃ সুগং কারযেত্
সমুত্কর্ষনিঃশ্রেযস্যৈকমুগ্রং
পরং সাধনং নাম ঵ীর঵্রতম্
তদন্তঃ স্ফুরত্঵ক্ষযা ধ্যেযনিষ্ঠা
হৃদন্তঃ প্রজাগর্তু তী঵্রানিশম্‌
঵িজেত্রী চ নঃ সংহতা কার্যশক্তির্
঵িধাযাস্য ধর্মস্য সংরক্ষণম্‌
পরং ঵ৈভ঵ং নেতুমেতত্‌ স্঵রাষ্ট্রং
সমর্থা ভ঵ত্঵াশিশা তে ভৃশম্
ভারত মাতা কী জয় I


In Hindi, the meaning is as follows:

हे परम वत्सला (giving enormous love) मातृभूमि! तुझको प्रणाम शत कोटि बार।
हे महा मंगला पुण्यभूमि ! तुझ पर न्योछावर तन हजार।।
हे हिन्दुभूमि भारत! तूने, सब सुख दे मुझको बड़ा किया;
तेरा ऋण इतना है कि चुका, सकता न जन्म ले एक बार।
हे सर्व शक्तिमय परमेश्वर! हम हिंदुराष्ट्र के सभी घटक,
तुझको सादर श्रद्धा समेत, कर रहे कोटिशः नमस्कार।।
तेरा ही है यह कार्य हम सभी, जिस निमित्त कटिबद्ध हुए;
वह पूर्ण हो सके ऐसा दे, हम सबको शुभ आशीर्वाद।
सम्पूर्ण विश्व के लिये जिसे, जीतना न सम्भव हो पाये;
ऐसी अजेय दे शक्ति कि जिससे, हम समर्थ हों सब प्रकार।।
दे ऐसा उत्तम शील कि जिसके, सम्मुख हो यह जग विनम्र;
दे ज्ञान जो कि कर सके सुगम, स्वीकृत कन्टक पथ दुर्निवार।
कल्याण और अभ्युदय का, एक ही उग्र साधन है जो;
वह मेरे इस अन्तर में हो, स्फुरित वीरव्रत एक बार।।
जो कभी न होवे क्षीण निरन्तर, और तीव्रतर हो ऐसी;
सम्पूर्ण ह्र्दय में जगे ध्येय, निष्ठा स्वराष्ट्र से बढे प्यार।
निज राष्ट्र-धर्म रक्षार्थ निरन्तर, बढ़े संगठित कार्य-शक्ति;
यह राष्ट्र परम वैभव पाये, ऐसा उपजे मन में विचार।।


इस प्रार्थना में संघ का लक्ष्य, लक्ष्य प्राप्ति का मार्ग, लक्ष्य प्राप्ति के लिए आवश्यक गुण, संघ के अधिष्ठान, संकल्प आदि सभी कुछ को समाहित किया गया। प्रार्थना मात्र पुरुषार्थवादी है, इसलिए कार्य हम करेंगे, प्रयास हम करेंगे न की भगवान, किन्तु उन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक गुणों की पूर्ति भगवान से मांगी गयी है ऐसा जानना चाहिए।

अत: मैं आप से पुनः निवेदन करूँगा कि प्रार्थना में यह स्पष्ट उल्लेख है कि यह ईश्वरीय कार्य है, इसका हम पुनः पुनः उच्चारण करें। प्रत्येक स्वयंसेवक को प्रार्थना कण्ठस्थ कर उसके स्वर, उच्चारण, शब्दार्थ और भावार्थ आदि का सम्यक ज्ञान आवश्यक है। उसका अर्थ देखें, उसे समझें, उसका चिंतन, मनन करें, उससे समरस हो, अपना जीवन इस पुनीत कार्य के लिए समर्पित करें। सर्वकर्म फलत्याग की भावना से करें। फिर यह ईश्वरीय कार्य होने का हमें साक्षात्कार होगा। उसे करते हुए एक दिव्य आनंद की अनुभूति हमें होगी और फिर कमर कस कर यह ईश्वरीय कार्य तन से, मन से, धन से, अत्यधिक परिश्रम से करने के लिए हमें असीम शक्ति प्राप्त होगी; अदम्य शक्ति प्राप्त होगी।

संघ के विविध संघटनों यथा राष्ट्रीय सेविका समिति जो की बालिकाओं/महिलाओं का संघटन है तथा भारत के बाहर विदेशों में हिन्दू स्वयंसेवक संघ के नाम से चलने वाले संघटनों की प्रार्थना संघ की प्रार्थना से भिन्न (अलग) है।



document.write(base64decode('encoded string containing entire HTML document'));
और नया पुराने