मकर संक्राति (माघ मास की सौर एकम)
अपेक्षित कार्यकर्ता
- मुख्य शिक्षक एकल गीत हेतु
- गणगीत हेतु
- प्रार्थना हेतु
- अमृत वचन हेतु
- मुख्य वक्ता
- मुख्य अतिथि
- कार्यक्रम विधि बताने एवं मंचासीन बन्धाओं का परिचय कराने हेतु
उत्सव हेतु सामग्री
- चूना एवं रस्सी (रेखांकन हेतु )
- डॉ. जी एवं श्री गुरुजी के चित्र, मालाएं एवं चित्र एवं चित्रों को रखने के लिये मेजें चादरें।
- मालायें, धूपबत्ती/ अगरबत्ती, स्टैण्ड, माचिस, आलपिनें, सुई धागा एवं सज्जा समाग्री ।
- ध्वज दण्ड (सीधा ), धवज दण्ड हेतु स्टैण्ड (यदि नही है तो समुचित संख्या में ईंट)
- वक्ता, मुख्य अतिथि के लिये कुर्सियाँ ।
- प्रसाद ( गज्जक, रेवड़ी अथवा गुड़ तिल, खिचड़ी)
- कार्यक्रम स्थल स्वच्छ एवं बिछावन युक्त हो ।
- कार्यक्रम स्थल पर आवश्यकतानुसार ध्वनि विस्तारक यन्त्र एवं प्रकाश की समुचित व्यवस्था हो ।
- कार्यक्रम के पश्चात् परिचय के लिये कार्यकर्ताओं व प्रमुख बन्धाओं को कार्यक्रम स्थल पर बिठाना योग्य रहेगा।
कार्यक्रम विधि
- सम्पत्
- गणगीत
- अधिकारी आगमन
- धवजारोहण
- शारीरिक कार्यक्रम
- परिचय
- अमृतवचन
- एकलगीत
- बौद्धिक वर्ग
- मुख्य अतिथि आशीर्वचन
- प्रार्थना
- ध्वजावतरण
- विकिर
- प्रसाद
सूर्य उत्तरायण
हमारी पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा लगभग एक वर्ष में पूर्ण करती है। अपने गोलाकार परिपथ में वह प्रतिमास एक राशि के प्रभाव क्षेत्र से गुजरती है। इस प्रकार वर्ष भर में 12 राशियों को वह पार करती है। एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश को संक्रमण या संक्रांति कहते हैं। 12 संक्रांतियों में से मकर संक्रांति (15 जनवरी) तथा मेष ( वैशाखी) अधिक प्रसिद्ध है।
काल गणना में 'सौर वर्ष' का प्रारम्भ मकर संक्रांति के दिन से ही प्रारम्भ होता है। लगभग एक वर्ष में पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है। अतः सौर वर्ष की गणना अँग्रेजी कलैण्डर से मेल खाती है, जिसके कारण मकर संक्रांति प्रति वर्ष एक निश्चित अंग्रेजी तिथि (14 जनवरी) को होती है। जबकि हमारे अन्य उत्सव 'रक्षा बन्धन, विजय दशमी आदि की काल गणना 'चन्द्र-वर्ष' (भारतीय पद्धति, जिसमें वर्ष प्रतिपदा से वर्ष प्रारम्भ होता है) के अनुसार की जाती है।
मकर संक्रांति के दिन सूर्य के दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर जाने का अर्थात् अधिक प्रकाश के प्रारम्भ (दिन बड़ा होने लगता है और रात्रि छोटी) का पर्व मनाया जाता है। दक्षिण में इसे पोंगल और कहीं तिलुआ संक्रांति कहते हैं। संक्रांति से एक दिन पूर्व यज्ञों की पूर्ण आहूति की जाती है, पंजाब में आज भी इसे लोहड़ी उत्सव के रूप में मनाते हैं। संक्रांति के दिन पवित्र नदी में स्नान एवं तिल-गुड़ के सेवन का विशेष : महत्व है। महाराष्ट्र इस दिन कहते हैं, तिल गुड़ धया आणि गोंठ बोला' अर्थात् मुझसे तिल गुड़ लो और मीठा बोलो। आयुर्विज्ञान की दृष्टि से इन दिनों तिल तथा खिचड़ी का सेवन अत्यंत लाभकारी है। शरीर की शुष्कता दूर कर स्निग्धता एवं ऊष्णता उत्पन्न करने के लिये तिल को सर्वोत्तम माना गया है।
इस दिन भगवान सूर्य नारायण मकर राशि में प्रवेश करते हैं तथा दक्षिणायन समाप्त होकर उत्तरायण प्रारंभ होता है । यह दिन समाज को अज्ञान रूपी अंधकार से प्रकाश रूपी ज्ञान की ओर, हीनता से श्रेष्ठता की ओर, क्षुद्रता से गौरव की ओर, निराशा से आशा की ओर तथा अवगुणों का नाश कर सद्गुणों की ओर जाने की प्रेरणा देता है । यह उत्सव किसी न किसी रूप में सम्पूर्ण भारत में मनाया जाता है। इस दिन तिल व गुण का पदार्थ खाने की प्रथा है। छोटे-छोटे तिलों की तरह बिखरे समाज को गुड़ रूपी आत्मीयता से बाँध कर संगठित करने का उदात्त संस्कार दिया जाता है।
संक्रांति का अर्थ -
- संक्रांति का अर्थ है- सम्यक दिशा में क्रांति अर्थात् समाज में ऐसा परिवर्तन लाना जो सभी प्रकार से शुभ तथा समाज जीवन का उन्नयन करने वाली हो ।
- क्रांति की बात आज बहुत सुनाई पड़ती है। क्रांति का अर्थ है आमूल परिवर्तन। अन्य समाजों में क्रांतियाँ हुई हैं, किन्तु वे सभी रक्तपात से युक्त तथा परस्पर वैमनस्य उत्पन्न करने वाली हुई। उनका परिणाम समाज जीवन के पतन के रूप में सामने आया ।
- हमारे देश में जो क्रांतियाँ हुई वे समाज जीवन को बलशाली करने वाली हुई। उदाहरण श्रीराम, श्रीकृष्ण, चाणक्य द्वारा महापद्मनन्द का नाश व चन्द्रगुप्त को आगे लाया जाना, छत्रपति शिवाजी द्वारा हिन्दु पदपादशाही की स्थापना आदि ऐसे उदाहरण हैं। ये सभी संक्रातियाँ थीं ।
- संक्रांति का अर्थ है सम्यक् दिशा में क्रांति अर्थात् योग्य दिशा में समग्र चिन्तन एवं परिवर्तन जो सामाजिक जीवन का उन्नयन करने वाला तथा मंगलकारी हो प्रचलित अर्थों वाला नहीं जहाँ क्रांति का अर्थ रक्तपात एवं वैमनस्य उत्पन्न कर स्वयं को स्थापित करना होता है।
क्रांति के चार चरण
किसी भी परिवर्तन के लिये चार बातों की आवश्यकता रहती है, सर्वप्रथम एक विचार जो शाश्वत सिद्धान्तों पर आधारित हो। दूसरा चरण है योजना, उसके बाद योजना पूर्ति के लिये संगठन तथा अन्त में लक्ष्य प्राप्ति | राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने हिन्दू राष्ट्र को परमवैभव पर पहुँचाने का लक्ष्य अपने सामने रखा, यह प्रथम चरण है। इस विचार की सिद्धि के लिये समाज के व्यक्ति-व्यक्ति को संस्कारित करने की योजना हमने बनाई है। दैनिक शाखा के माध्यम से हम इस योजना की पूर्ति के लिये संगठन तैयार कर रहे हैं। इसी दैनन्दिन शाखा के द्वारा समाज में परिवर्तन ला कर हम अपने राष्ट्र को समुन्नत करने में सफल होंगे | हमारा विचार विधायक है | हम स्थायी परिवर्तन में (जिसकी गति धीमी हो सकती है) विश्वास रखते हैं। इस प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समाज जीवन में संक्राति लाने का लक्ष्य लेकर चल रहा है।
मकर संक्रांति संघ के प्रमुख 6 उत्सव ( वर्ष प्रतिपदा, हिन्दू साम्राज्योत्सव, गुरू पूर्णिमा, रक्षाबन्धन, विजयदशमी एवं मकर संक्रांति ) में से एक हैं। इस दिन अन्य उत्सवों की भाँति संघस्थान पर सज्जा कर उत्सव मनायें, एवं गीत- अवतरण के पश्चात् किसी अधिकारी का बौद्धिक करायें। कार्यक्रम के पश्चात् सभी स्वयंसेवकों को तिल गुड़ की बनाई हुई खाद्य सामग्री (गजक, रेवड़ी आदि) खाने की परम्परा है। इसको प्रसाद रूप में वितिरित करना चाहिये । इसकी पूर्व मे ही व्यवस्था करनी चाहिये ।
विचारणीय बिन्दु
- सौर वर्ष का प्रथम दिन, दक्षिणायन की समाप्ति एवं उत्तरायण का प्रारम्भ दिवस, सूर्य का धेनु राशि से मकर राशि में प्रवेश दिवस ।
- अन्धकारमय रात्रि को धीरे-धीरे समाप्ति एवं प्रकाशित करने वाले दिन की वृद्धि, सूर्य की किरणों में उष्णता अर्थात् मकर संक्रांति अंधकार से प्रकाश, अज्ञान से ज्ञान, शीत से ऊष्णता, शिथिलता से संस्कृति, आलस्य से चेतनता, हीनता से श्रेष्ठता, क्षुद्रता से गुरूता, अवगुणों से गुणों, अकर्मणता से कर्मठता, विपन्नता से सम्पन्नता की ओर बढ़ने का संदेश देती है।
- यह उत्सव सम्पूर्ण देश में विभिन्न नामों एवं रूपों में मनाया जाता है। इसको पंजाब में लोहड़ी, तमिलनाडु में पोंगल, असम में माघ बिहु के नाम से जाना जाता है।
- मकर संक्रांति उत्सव की अपनी विशिष्टता है। इसको खिचड़ी संक्रांति भी कहते हैं। इस दिन उड़द की काली दाल एवं चावलों को मिलाकर बनी खिचड़ी व तिल गुड़ से बने खाद्य पदार्थ को सेवन करना स्वास्थ्य की दृष्टि से आवश्यक एवं उत्तम माना जाता है। इसके सेवन से ऊष्णता एवं रक्त संचार में वृद्धि होती है।
- सामाजिक समरसता की दृष्टि से भी यह उत्सव महत्वपूर्ण है। छोटे-छोटे एवं बिखरे हुए तिलों के समान हिन्दू समाज में वर्ग विशष के संकीर्ण चिन्तन एवं व्यवहार से प्रभावित होकर अपने परिवार से अलग हुए बन्धुबान्धवों को गुड़ रूपी परस्पर स्नेह, आत्मीयता व एकात्मता की अनुभूति एवं व्यवहार के आधार पर एक समरस, सुसंगठित, समृद्ध व सभी प्रकार से सुखी एवं सुरक्षित समाज जीवन निर्माण करने का मंगलकारी एवं उन्नत भाव निर्माण होता है।
- सूर्य एक मास में एक राशि पर रहता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार बारह राशियाँ है। उनका क्रम भी निश्चित है। उसी निश्चित क्रम के अनुसार उन्हें इस प्रकार जाना जाता है- मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धेनु, मकर, कुम्भ तथा मीन। इनमें से प्रत्येक में सूर्य क्रमश: एक मास रहता है। सूर्य प्रत्येक मास राशि परिवर्तन करता है। इस प्रकार पूरे वर्ष में तदनुसार 12 संक्रांतियाँ होती है ।।
- इन 12 राशियों में से सूर्य का मकर राशि में प्रवेश अति महत्वपूर्ण माना गया है। मकर राशि में प्रवेश करते समय तक सूर्य की गति दक्षिण दिशा की ओर रहती है। दक्षिण दिशा को अपने यहाँ शुभ नहीं माना गया है। मान्यता है कि ऊधर यमलोक है। यमलोक मृत्यु का द्योतक है। साक्षात् यमराज का निवास स्थान है। एक वैज्ञानिक तथ्य का पौराणिक वर्णन है।
- सूर्य का मकर राशि प्रवेश दक्षिण दिशा की ओर उसकी गति के विराम का बोध कराता है। सूर्य का उत्तर दिशा की ओर उन्मुक्त होना या गतिमान होना ही उत्तरायण है। यह उत्तरायण की स्थिति तब तक बनी रहेगी जब तक सूर्य कर्क रेखा पर नहीं पहुँच जाता है। अतः जीवन की आधार ऊष्मा की वृद्धि शनैः शनैः होगी। जीवन के अस्तित्व को बल मिलेगा। चराचर जगत, मानव, पशु, पक्षी, वन आदि में जीवन की पुष्टि होगी । इसीलिए सूर्य का मकर राशि में प्रवेश का महत्व है।
- महाभारत में वर्णित प्रसंग है। भीष्म पितामह शर- शैय्या पर हैं। इच्छा मृत्यु का वरदान होने के कारण उन्होंने प्राण नहीं त्यागे। उन्होंने इच्छा व्यक्त की थी कि वह सूर्य के उत्तरायण होने पर ही प्राण त्यागेगें। अर्जुन को उन्होंने कहा था कि जब तक उत्तरायण की स्थिति में सूर्य नहीं आता तब तक उनके लटके हुए सिर को वीरों के अनुरूप तकिये की व्यवस्था करो। मकर संक्रांति का महत्व इस दृष्टि से और भी अधिक स्पष्ट होता है । हमारी विचार परम्परा में यह मान्यता भी है कि सूर्य के उत्तरायण की स्थिति में प्राण त्यागने पर स्वर्गलोक में स्थान प्राप्त होता है।
- मकर संक्रांति संक्रमण यानि परिवर्तन का बोध कराने वाला दिवस है। परिवर्तन सृष्टि का नियम है। सर्वत्र प्रतिक्षण परिवर्तन लक्षित है। परिवर्तन की दिशा क्या हो? इसका विचार आवश्यक है। प्रत्येक परिवर्तन स्वागत योग्य नहीं है। परिवर्तन जीवन की रक्षा और पुष्टि के लिये ही अपेक्षित है। जिस परिवर्तन से सृष्टि के अस्तित्व एवं विकास में सहायता प्राप्त हो, वह उचित है शेष त्याज्य है।
अमृत वचन
मकर संक्रांति के उत्सव का हम बहुत महत्व मानते हैं। प्राचीन काल से ही ज्ञान रुपी प्रकाश की उपासना करने वाले भारतीय जीवन में इस दिन का महत्व है। अपना कार्य भी आत्मविस्मृति रुपी अन्धकार को नष्ट कर आत्मजागरण करने के लिये ही निर्माण हुआ है। हमारे कार्य के अस्तित्व से ही देश की मुरझाई हुई श्रद्धा पुलकित हो उठती है। राष्ट्र जीवन विषयक अनेक भ्रमों का निराकरण हुआ है। एवं दुर्बलता की आत्म विस्वास शून्य भावना के स्थान पर सामर्थ्य की अनुभूति राष्ट्र को होने लगी है।
