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संघ एक कार्यप्रणाली है। डॉ. साहब का जीवन ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है, बीज रूप में डॉ. जी ने अपना जीवन खपाया और श्री गुरु जी ने इसे सींचा । संघ व्यक्ति निर्माण करता है, व्यक्ति जो कि समाज की सबसे छोटी इकाई है। संघ जो आज एक वट वृक्ष की तरह खड़ा है उसकी विकास यात्रा एक बीज से प्रारंभ हुई थी। 100 वर्षों के इस यात्रा को हम आज समझेंगे ।
संघ की विकास यात्रा 1925 से अब तक
- 27 सितंबर, 1925 को विजय दशमी के दिन अपने घर में 17 निकटस्थ मित्रों के साथ बैठ कर आज से हम सभी मिलकर संघ प्रारंभ कर रहे हैं।
- वर्ष 1926- 17 अप्रैल 1926 को राम टेक पर राम नवमी के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम सुनिश्चत हुआ। पहली बार इस नाम से वहाँ सेवा कार्य किया।
- एवं 28 मई 1926 को मिहिते के बाड़े में विधवत दैनिक शाखा प्रारंभ हुई।
- नागपुर के बाहर वर्धा में संघ की प्रथम शाखा आपा जी जोशी ने प. पू. डॉ जी के सिनिध्य में प्रारंभ की।
- 19 दिसंबर 1926 को सभी मा. संघचालकों ने मिलकर पू डॉ जी को औपचारिक रूप से संघ का प्रमुख चुना।
- 1926 में पहली बार अधिकारी शिक्षण वर्ग (संघ शिक्षा वर्ग) लगा गणवेश, समता व संचलन प्रारंभ हुआ। ऐसे प्रशिक्षत स्वयंसेवकों द्वारा ही संघ का विस्तार हुआ ।
- 1928 से गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु के रूप में परम पवित्र भगवा ध्वज का गुरु के रूप में पूजा हुआ व श्री गुरु दक्षिणा संपन्न हुआ। उसी वर्ष प्रतिज्ञा कार्यक्रम प्रारंभ हुआ।
- 1928 में प्रथम शीत शिवर लगा। घोष के साथ संचलन निकाला। संचलन गीत का गायन हुआ।
- 19 नवंबर 1929 को प्रथम बार सरसंघचालक प्रणाम दिया गया।
- 21 जुलाई 1930 को जंगल सत्याग्रह में सहभागी होने का प. पू. डॉ जी निश्चय किया। सरसंघचालक का दायित्व कुछ समय के लिए डॉ परांजपे जी के हाथ सौंपा। 14 फ़रवरी 1931 को जेल से मुक्त, भारी स्वागत।
- 1934 में वर्धा शिवर में महात्मा गांधी जी पधारे।
- 1935 से संघ शिक्षा वर्ग पहली बार नागपुर से बाहर होने लगा। पहला वर्ग पुणे में लगा।
- वंदनीय मौसी जी का पू डॉ जी के साथ वार्तालाप के पश्चात मौसी जी ने विजय दशमी के दिन 1936 में राष्ट्रीय सेविका समिति की स्थापना की।
- 1939 में हैदराबाद के निज़ाम द्वारा जो हिंदू विरोधी नीति रही, उसके विरोध में स्वयंसेवकों ने भारी संख्या में सहभाग लिया।
- 1939 में संघ में प्रथम चिंतन बैठक - संघ के सभी कार्यकर्ताओं के साथ चिंतन, दीर्घ विचार विमर्ष कार्यपद्धति में परिवर्तन संस्कृत भाषा में आज्ञाएँ, आचार विभाग तथा संस्कृत में नयी प्रार्थना स्वीकृत की गई।
- 1940 के संघ शिक्षा वर्ग में सभी प्रांतों से आये शिक्षार्थी स्वयंसेवकों की उपस्थिति में डॉ जी का अंतिम भाषण हुआ आज में अपनी आँखों से संपूर्ण भारत देख रहा हो।' याची देही याची डोला। अपने जीवन में कभी यह कहने का अवसर ना आये - मैं भी कभी स्वयंसेवक था इसका ख्याल रखियेगा ।
- 21 जून 1940 को डॉ जी ने देहावसान के एक दो दिन पूर्व प. पू. गुरु जी को सरसंघचालक मनोनीत किया ।
- पू डॉ जी के देहावसान के बाद पू गुरु जी द्वितीय पू. सरसंघचालक हुए। उनके अहवान पर 1 साल के लिए 400 कार्यकर्ता पूर्ण समय के लिए निकले 1942 में गणवेश में परिवर्तन ।
- द्वितीय विश्वयुद्ध और मुस्लिम समस्याओं के कारण श्री गुरु जी को यह ज्ञात हो गया था कि भारत का विभाजन होगा। अपने सिंध के प्रवास में 5 अगस्त 1947 को श्री गुरु जी ने स्वयंसेवकों को आह्वान किया कि हर एक हिंदू को सुरिक्षत निकालना, हमारा कर्तव्य है, भले ही हमें प्राण गवाने पड़े। अपने कर्तव्य पूर्ति में सैंकड़ों स्वयंसेवक शहीद हो गये। विस्थापितों के सहायतार्थ पंजाब रिलीफ कमेटी / वस्तुहारा सहायता सिमित बनाई गई।
- जम्मू कश्मीर विलय में पू. श्री गुरु जी एवं महाराजा हरि सिंह की वार्ता 17 अक्टम्बर 1947 की भेंट सार्थक रही।
- महात्मा गांधी हत्या का मिथ्या आरोप लगाकर 4 फरवरी 1948 को संघ पर प्रतिबंध शासन द्वारा थोपा गया संघ शाखा के विसर्जन की घोषणा श्री गुरु जी ने काराबंधि में रहते हुए भी धैर्यपूर्वक संयम से काम लिया। 9/12/1948 तक शासन के साथ पत्राचार करते रहे। सरकार टालमटोल करती रही।
- 9/12/1948 को श्री गुरु जी द्वारा सत्याग्रह का आह्वान 77090 स्वयंसेकों द्वारा सत्याग्रह व जेल में भयानक यातनाएँ 21 फ़रवरी 1949 को सत्याग्रह स्थगित ।
- गांधी हत्या की जाँच के लिए सरकार द्वारा आयोग स्थापित न्यायालय का निर्णय, गांधी हत्या में संघ का कोई हाथ नहीं। पंजाब उच्च न्यायालय 2 मई 1949 का निर्णय, संघ निर्दोष ।
- 11 जुलाई 1949 को बिना शर्त प्रतिबंध हटा।
- संघ का संविधान अस्तित्व में आया।
- समाज पिड़ित व संघ का सहयोग - 15 अगस्त 1950 असम में भूकंप तथा बाढ़ पिड़ितों के लिए सहायतार्थ भूकंप पिड़ित सहायता सिमित का गठन।
- 1951 में बिहार के अकाल पिड़ितों के लिए अकाल ग्रस्त सहायता सिमित का गठन।
- 1952 में गौ हत्या के विरोध में आंदोलन।
- 2 अगस्त 1954 में दादर नगर हवेली मुक्ति आंदोलन में सहभाग ।
- 1954 में सिंधी में दूसरी चिंतन बैठक चिंता निराशा को दूर किया गया। यह बात स्वीकार की गई संघ का कार्य परिस्थिति निपेक्ष है। संघ व्यक्ति निर्माण एवं उनका संगठन के अतिरिक्त कुछ भी नहीं करेगा, स्वयंसेवक कुछ भी नहीं छोड़ेगा, यह चितार्थ होने लगा।
- विवध क्षेत्र द्वारा समाज परिवर्तन- 9 जुलाई 1949 को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद
- 1951 में भारतीय जन संघ (बाद में 1977 में जनता पार्टी में विलय हुई. बाद में 1980 में भारतीय जनता पार्टी बनी)
- 1951 में वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना ।
- 1954 में भारतीय मज़दूर संघ की स्थापना।
- 1952 में गोरखपुर में वर्तमान का विद्या भारती का पहला विद्यालय प्रारंभ ।
- 1962 में प.पू. डॉ जी की नूतन समाधि का उद्घाटन ।
- 1963 में स्वामी विवेकानंद शताब्दी कन्याकुमारी में विवेकानंद शीला स्मारक का निर्माण प्रारंभ 1965-1968 तक स्मारक के लिए धन संग्रह मा. एकनाथ राणाडे जी ।
- 1964 में श्री गुरु जी की प्रेरणा एवं उपस्थिति में संदीपनी आश्रम मुंबई में विश्व हिंदू परिषद की स्थापना।
- 1966 में प्रयाग में पूर्ण कुंभ के अवसर पर विश्व हिंदू स्मेलन में सभी शंकराचार्य एवं साधु संत एक मंच पर उपस्थित हुए।
- 1971 में बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के समय नागरिक रक्षा और सहायता में स्वयंसेवकों की महत्वपूर्ण भूमिका ।
- 1972 में तृतीय चिंतन बैठक थाने में सभी पक्षों के बीच समन्वय बनाये रखने का कार्य श्री दत्तोपंथ ठेंगड़ी जी को दिया गया। कार्य विस्तार की योजना पर बल दिया गया ।
- 5 जून 1973 को पूज्य श्री गुरु जी महाप्रयाण गुरु जी द्वारा लिखे गए तीन पत्रों के अनुसार - स्व बालासाहब देवरस जी पू सरसंघचालक नियुक्त हुए। दूसरे पत्र में कोई स्मारक नहीं बनाना। तीसरे पत्र में लंबे अवधि के प्रवास क्रम में हुई. गलितयों एवं असुविधाओं के लिए सब से क्षमा याचना की।
- 6 जून 1973 को पू, बालासाहब देवरस संघ के तृतीय सरसंघचालक बने ।
- 5 जून 1973 को गुरूजी के महापरायण में वे पूजनीय बालासाहब देवरस जी को तृतीय सरसंघचालक नियुक्त करते हैं।
- 1975 का आंतरिक आपातकाल इंदिरा गांधी ने घोषित किया और संघ पर प्रतिबंध लगा दिया, जिसका स्वयंसेवकों ने विरोध किया सत्याग्रह किया, जनजागरण अभियान चलाया, 1 लाख से अधिक गिरफ्तारियां दी, भयंकर यातनाएं सही लेकिन डिगे नहीं और फिर 1977 में संघ से प्रतिबंध हटा और संघ पुनः राष्ट्रनिर्माण के कार्य में लग गया।
- 1979 की विजयदशमी में निर्णय लिया गया विशेष जनसंपर्क अभियान चलेगा ।
- 1985 में संघ स्थापना के 60 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष में भी विशेष जन जागरण अभियान शुरू किया गया।
- 1989 में डॉ. साहब का जन शताब्दी वर्ष मनाया गया, पुणे में पूर्व व वर्तमान प्रचारकों का एकत्रीकरण हुए जिसमें सेवा कार्य शुरू करने के प्रण लिए और नर सेवा नारायण सेवा जैसे न्यास की स्थापना हुई।
- 1989 में ही राम जन्मभूमि के ताले खुलवाये गए।
- 1990 में सेवा, सम्पर्क और प्रचार विभाग अलग से अस्तित्व में आया ।
- 1990 में शिला पूजन कार्यक्रम किये 30 अक्तूबर को कार सेवक जगह जगह से एकत्र हुए, 2 नवम्बर को निहत्थे कारसेवकों पर मुलायम सिंह ने गोली चलवाई जिसमें सैंकड़ों स्वयंसेवक बिलदान हो गये।
- 6 दिसम्बर 1992 को 500 वर्षों का कलंक, बाबरी ढांचा ढाह दिया गया । 10 दिसम्बर को संघ पर फिर प्रतिबंध लगा दिया और भाजपा की राज्य सरकारों को बर्खास्त कर दिया गया 4 जून 1993 को कोर्ट के हस्तक्षेप द्वारा संघ से प्रतिबंध फिर हटा।
- 10 मार्च 1994 को पूजनीय बालासाहब देवरस जी ने प्रोफ. राजेन्द्र सिंह उपाख्या रज्जू भैया को चौथा सरसंघचालक घोषत किया ।
- 10 मार्च 2000 को यह दायित्व पूजनीय सुदर्शन जी को सौंपा गया, उसी वर्ष संघ के 75 वर्ष पूर्ण होने पर 75 हज़ार गाँवों में सपर्क किया गया ।
- 2005 से 2007 में रामसेतु को बचाने के लिए अभियान चलाया गया जिसे उस समय की सरकार नष्ट करना चाहती थीं जबकि नासा भी उसका अस्तित्व मान चुकी है।
- 2006 में श्री गुरूजी का जन्म शताब्दी वर्ष सामाजिक सद्भावना और सामाजिक समरसता के नाते विशाल हिन्दू सम्मलेन किये गए विदेशों में भी कार्य शुरू किया। आज 40 से ज्यादा देशों में संघ का काम है।
- 21 मार्च 2009 को पूजनीय सुदर्शन जी ने सरसंघचालक का दायित्व पूजनीय डॉ. मोहन भागवत जी को सौंपा और वो छठे सरसंघचालक बने और अभी वर्तमान में भी सरसंघचालक हैं।
- 2010 के कार्यकारिणी मंडल में राष्ट्रीय जन जागरण अभियान के दौरान ही संगठन और जागरण श्रेणी की रचना हुई, चमड़े की पेटी के स्थान पर नायलान की पेटी आई । समाज को जोड़ने के लिए पहले 5 गितिविधियों शुरू की गई फिर छठी गितिविधि उसमें जोड़ी गई।
- संघ हर समय समाज के साथ खड़ा रहा चाहे वो 1984 के सिख दंगे हो कारिगल युद्ध का समय हो, कच्छ और भुज में भूकंप हो, उत्तराखंड की त्रासदी हो रेल दुर्घटनाएं हों या फिर अभी कुछ समय पहले आया कोरोना काल का समय हो जिसमें मृत देह को परिवारों के सदस्यों ने भी हाथ लगाने से मना कर दिया था लेकिन संघ के स्वयंसेवक अपनी जान जोखिम में डालकर डटे रहे।
- 70% जनसंख्या गाँव में रहती है तो उनके लिए कृषक कार्य शुरू किया गया । अभी पंच प्रण का विषय है जिसमें कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण, सामिाजक समरसता, नागरिक कर्तव्य, स्व (स्वदेशी)।
- निक्कर हमारी पहचान थी परन्तु हमने समाज में सम्मिलित होने के लिए निक्कर को हटाया और गणवेश में पैंट आ गई।
- देश में हजारों शाखाएं हैं, विश्व में कोई संगठन इस मुकाबले में नहीं है
- हम कम्युनिस्ट पार्टी से लगभग 5 वर्ष छोटे हैं, विश्व में रूस, चीन आदि कम्युनिस्ट देश आपस में लड़कर खत्म हो रहे हैं, लेकिन हम आज भी विकास में लगे हुए हैं और निरंतर बढ़ते जा रहे हैं।
- 100 वर्षों के इस समय में हम चाहते हैं कि संघ समाज में विलीन हो जाये जगन्नाथ जी के रथ को रुकने नहीं देना है हमें। यह प्रण लेकर जाएँ कि संघ के कार्य को घर घर में पहुँचाना है।
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