नई शाखा खोलने की पद्धति
सबसे पहले ग्राम अथवा बस्ती का चयनकर उस स्थान का समग्र विचार करना। (जनसंख्या, सामाजिक व भौगोलिक स्थिति, दृष्टिकोण, सम्पर्क सूत्र, आने-जाने के साधन, जाने वाले कार्यकर्ता का नाम व उसकी उपलब्धता, अनुकूलता, प्रतिकूलता, संघस्थान की उपलब्धता आदि का विचार करना । )
चयनित स्थानों पर प्रारम्भ में संघ के सभी छः उत्सव मनाना उत्सवों के माध्यम से एकत्रित स्थानीय बन्धुओं को संघ के विचारों से अवगत कराना तथा संघ कार्य गाँव / बस्ती की आवश्यकता है। ऐसा अनुभव कराना ।
एकत्र आये बन्धुओं में से अनुकूल बन्धुओं को सूचीबद्ध कर उनमें से तीन-चार सक्षम, सक्रिय व उत्साही बन्धुओं के माध्यम से संघ मण्डली तथा बाद में साप्ताहिक मिलन प्रारम्भ करना। इन्हीं बन्धुओं को निकट की शाखा के एकत्रीकरण या नैपुण्य वर्ग में भी बुलाना ।
संघ मण्डली
- स्वयंसेवक अथवा कार्यकर्ता विहीन नये स्थानों पर मण्डली प्रारम्भ करना अपेक्षित है। ये स्थान नये, सम्पर्कित अथवा पूर्व शाखा स्थान भी हो सकते हैं।
- मास में न्यूनतम एक बार, निश्चित दिन, निश्चित समय और निश्चित स्थान पर एकत्रीकरण । संघ मण्डली का प्रमुख भी निश्चित करना चाहिये ।
- संघ मण्डली में ध्वज व प्रार्थना आवश्यक नहीं।
- संघ मण्डली में शारीरिक, बौद्धिक अथवा हिन्दुत्व जागरण के कोई भी कार्यक्रम हो सकते हैं। कुछ समय बाद मण्डली को मिलन में बदलना चाहिये।
साप्ताहिक मिलन
- मण्डली व बन्द शाखा स्थान पर साप्ताहिक मिलन प्रारंभ करना ।
- साप्ताहिक मिलन का दिन, स्थान, समय व मिलन प्रमुख निश्चित करना।
- निकटस्थ शाखा से साप्ताहिक मिलन का 'मिलन पालक' निश्चित करना ।
- प्रार्थना अनिवार्य है परन्तु ध्वज आवश्यक नहीं।
- मिलन, मण्डली प्रमुखों तथा पालकों का नियमित प्रशिक्षण होना चाहिये ।
- मिलन को धीरे-धीरे शाखा में परिवर्तित करने का प्रयास हो। इसके लिये चयन कर मिलन के कार्यकर्ताओं को संघ शिक्षा वर्ग कराना।