स्वयंसेवक के गुण एवं व्यवहार
स्वयंसेवक का व्यवहार
संघ कार्य में
स्वयंसेवक के साथ परस्पर बंधुभाव -
निःस्वार्थ, निश्छल, आत्मीयता व स्नेहपूर्ण व्यवहार ( पारिवारिक अनुभूति) से ध्येय की ओर बढ्ने वाला। एक-दूसरे का विकास करने के प्रयत्न में संलग्न (कई बार मित्रता तो बनी रहती है, परंतु संघ बीच में से निकल जाता है, यह योग्य नहीं है) सबके गुण गुणावलोकन करने वाला, दोषान्वेषण करने वाला नहीं।
स्वयंसेवकों का अधिकारी के प्रति -
आधार, श्रद्धा व विश्वास युक्त व्यवहार । अधिकारी के मार्गदर्शन के अनुसार जीवन में सद्गुण लाने का प्रयत्न । सदैव गुण ग्रहण करने की भूमिका कार्य को उत्तरदायित्व पूर्ण तथा प्रामाणिकता से संपन्न करने का भाव, अनुशासनयुक्त व्यवहार बनावटी व्यवहार हमारे विकास तथा कार्य में बाधक होगा।
अधिकारी का स्वयंसेवकों के प्रति -
स्वयंसेवक के विकास के लिए सहयोगी एवं मार्गदर्शक कार्य वृद्धि की दृष्टि से विधि निषेध सहित बताए गए व्यवहार को अपने जीवन में भी क्रियान्वित करने वाला, पक्षपात रहित व आत्मिकता पूर्ण व्यवहार । स्वयंसेवकों को धीरे-धीरे आगे बढाते हुए उनका संघ से सीधा संबंध जोड़ने वाला | माता जैसा वात्सल्य, पिता जैसा हितचिंतक, बड़े भाई जैसी आत्मीयता, मित्र जैसी अभिन्नता ।
समाज के साथ व्यवहार -
समाज के प्रति श्रद्धा भावी सदैव समाज के हित के लिए चिंतन करने वाला, समाज के प्रत्येक घटक से बंधुभाव, समाज के सुख-दुःख में संवेदनाओं के साथ तादात्म्य भाव। भीषण परिस्थितियों में भी देश एवं समाज कार्य के लिए सदैव तत्पर रहने वाला (संकट व चुनौतियों के समय आगे और पुरस्कार मिलते समय सदैव पीछे रहने वाला) अहंकार शून्य, सेवाभावी, स्नेहिल व्यवसाय, नौकरी में प्रामाणिक परिवार, वर्ग, भाषा, संस्था, प्रान्त, संप्रदाय आदि के मिथ्याभिमान से दूर रहने वाला ।
व्यक्तिगत जीवन में -
मृदुभाषी, निश्छल, पारदर्शी, नियमित, व्यवस्था प्रिय समय नियोजक, हंसमुख, मितव्ययी, मिलनसार, संवेदनाशील, समय- पालक, व्यक्तिगत, पारिवारिक सामाजिक तथा सामूहिक जीवन में कर्तव्यों को आचरण में प्रकट करने वाला। सभी कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए संघ कार्य को प्राथमिकता देने वाला व स्वदेशी का आग्रही । परिवार जनों में संघ कार्य के प्रति श्रद्धा, आत्मीयता एवं विश्वास निर्माण करने वाला। संघ के संस्कारों के कारण जीवन में सगुण संपदा बढ़ रही है, ऐसा परिवार जनों को आभास कराने वाला किसी भी प्रकार के संकट ( आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक आदि) आने पर भी मन का संतुलन बनाए रखने वाला सर्वत्र व्यवहार में तादात्म्य भाव, मर्यादा- पूर्ण व्यवहार, विवेक, बुद्धि ।
स्वयंसेवक के गुण
- अक्षय ध्येय-निष्ठा
- निरंतर साधना
- 24 घंटे का स्वयंसेवक
- चरित्रवान
- समर्पण (अहंकार शून्यता, अनुशासित एवं संघानुकूल जीवन - रचना)
- व्यवहार कुशलता (छोटे बड़े स्वयंसेवकों, परिवार निवास व व्यवसाय क्षेत्र आदि के प्रति )
- दृढ़ता (वीरव्रत जैसे "लहू देंगे परंतु देश की माटी नहीं देंगे")
- आत्मविश्वास
- आत्म-निरीक्षण
- तत्व तथा व्यवहार में एकरूपता ( कथनी करनी समान)
- लोकसंग्रही
- प्रयत्नपूर्वक स्वयं के सर्वांगीण विकास के लिए आग्रही (अधिककाधिक दायित्व ग्रहण करने की मानसिकता)