शरद पूर्णिमा
शरद पूर्णिमा से सर्दी शुरू हो जाती है और इस दिन पूर्णिमा तिथि भी होती है, इसलिए इस शरद पूर्णिमा कहते हैं। इसी दिन महर्षि वाल्मीकि का जन्म हुआ था, इसलिए इसे वाल्मीकि जयंती भी कहते हैं। कालगणना के अनुसार इस दिन शुक्ल पूर्णिमा पड़ती है ।
महर्षि वाल्मीकि ऋषि बनने से पूर्व दस्यु प्रवृत्ति के थे और उनका नाम रत्नाकर था। नारद जी द्वारा ज्ञान प्राप्त कर वे दस्यु से महर्षि बन गए। इस घटना से यह पता चलता है कि व्यक्ति में विकास और उत्थान की असीम सम्भावनाएं हैं । वह नर से नारायण बन सकता है। इस दिन हम सब भी अपने दुर्गुणों को समाप्त कर उत्थान की ओर बढ़ें। यही इस उत्सव का संदेश है ।
इसी दिन भगवान कृष्ण ने ब्रज की गोपियों के साथ महारासलीला की थी। हर गोपी को ऐसा लगता था मानो भगवान श्रीकृष्ण उसके साथ रास कर रहे हैं और रास करते हुए स्त्री-पुरुष भेद समाप्त हो गया है। स्त्री-पुरुष भेद समाप्त होना समाधि की उच्चतम सीमा है। एक से अनेक होना ईश्वरीय तत्त्व है। हम भी इन गुणों को अपने अंदर लायें, यही रासलीला का भाव है ।
इसी दिन रात्रि को चन्द्रमा के प्रकाश में खीर रखकर खाने की परम्परा है। हमारे ऋषि-मुनियों ने हमें बताया कि इस दिन चन्द्रमा की किरणों में विशेष औषधि-बल आ जाता है और इस औषधि - बल को ग्रहण करने की क्षमता केवल खीर (चरू) में होती है। इस खीर को खाने से व्यक्ति वर्षभर स्वस्थ रहता है और उसकी रोग-निरोधक शक्ति बढ़ जाती है। आधुनिक विज्ञान को इस विषय पर अनुसंधान कर मानवता के कल्याण का रास्ता प्रशस्त करना चाहिए ।
हमारे हिन्दू समाज में भी अनेकों बीमारियों हैं। जिनका समय-समय पर हमारे महापुरुष इलाज करते रहे हैं। पं. पू. डॉक्टर हेडगेवार ने भी हिन्दू-समाज की सभी बीमारियों अचूक निदान ढूंढा और वह अचूक निदान इस प्रकार है-
भारत एक राष्ट्र है और वह हिन्दू राष्ट्र है ।