शरद पूर्णिमा
शरद पूर्णिमा से सर्दी शुरू हो जाती है और इस दिन पूर्णिमा तिथि भी होती है, इसलिए इस शरद पूर्णिमा कहते हैं। इसी दिन महर्षि वाल्मीकि का जन्म हुआ था, इसलिए इसे वाल्मीकि जयंती भी कहते हैं। कालगणना के अनुसार इस दिन शुक्ल पूर्णिमा पड़ती है ।
शरद पूर्णिमा कार्यक्रम में बौद्धिक के बिंदुओं को 25 से 30 मिनट में रखना चाहिए। बौद्धिक के विषय को निम्न बिंदुओं के अंतर्गत प्रस्तुत करना चाहिए:
- शरद पूर्णिमा का धार्मिक महत्व
- शरद पूर्णिमा का वैज्ञानिक महत्व
- वाल्मीकि जयंती तथा सामाजिक समरसता
- पंच प्रण - सामाजिक समरसता, कुटुम्ब प्रबोधन, पर्यावरण, स्व का भाव, नागरिक कर्तव्
- लोक जागरण
शरद पूर्णिमा का धार्मिक महत्व :-
- अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा मनाया जाता है। यह दिन शरद ऋतु के आने का संकेत देता है।
- पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शरद पूर्णिमा के दिन ही समुद्र मंथन के बाद मां लक्ष्मी की उत्पत्ति हुई थी । इस दिन मां लक्ष्मी धरती पर विचरण करती है और अपने भक्तों पर कृपा बरसाती है। रात भर लोग अपने घरों के बाहर जग पूजा करते रहते हैं। मान्यता है कि जो जागता है उसे ही माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। इसलिए शरद पुर्णिमा को कोजागिरी पूर्णिमा भी कहते हैं ।
- इसे कॉमुदी पूर्णिमा भी कहा जाता है। ब्रह्मपुराण, स्कंद पुराण आदि में इस रात्रि का विशाल वर्णन मिलता है ।
- शरद पूर्णिमा की रात्रि को चंद्रमा सोलहो श्रृंगार से परिपूर्ण रहता है। इसकी चांदनी पूरी धरती को सराबोर करती है।
- चंद्रमा की चांदनी में रात्रि में अमृत वर्षा होती है इसलिए सभी लोग रात भर चंद्रमा की चांदनी में खेलकूद करते हैं और खीर बनाकर चंद्रमा की चांदनी में रखते हैं ।
- चंद्रमा से अमृत की वर्षा होती है वह खीर अमृत युक्त हो जाती है। सभी खीर का पान करते हैं और सुखद अच्छे स्वास्थ्य की प्राप्ति करते हैं ।
वैज्ञानिक महत्व :-
- शरद पूर्णिमा का चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से परिपूर्ण होकर पृथ्वी के सबसे नजदीक होता है। इस दिन चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल बढ़ा हुआ रहता है और चंद्रमा की किरणों से अमृत की वर्षा होती है।
- आयुर्वेदाचार्य सालभर शरद पूर्णिमा का इंतजार करते हैं जीवनदायनी, रोगनाशक जड़ी बूटियो को पूर्णिमा की चांदनी में रखते हैं। अमृत से नहाई हुई इन जड़ी बूटियो से जब दवा बनाई जाती है तो वह रोगियों पर तुरंत असर करती है । प्राचीन ग्रंथो में चंद्रमा को औषधीश यानि औषधी का स्वामी कहा जाता है।
- कुछ वर्ष पूर्व BHU के वैज्ञानिकों ने पाया कि खीर बनाने में प्रयुक्त दुग्ध में मौजूद लैक्टिक अम्ल और चावल में मौजूद स्टार्च, शक्कर का ग्लूकोस ये तत्व चंद्र किरणों की शिक्त को अधिक मात्रा में अवशोष कर अधिक गुणवत्ता युक्त हो जाते हैं।
- काशी के आयुर्वेदाचार्य शांतनु मिश्र बताते हैं कि शरद पूर्णिमा के दिन काशी के गढ़वाघाट मठ में अनेक वर्षों से अस्थमा पीड़ितों के लिए खास औषधि का वितरण किया जाता है, जो चंद्र किरण से तैयार होती है ।
- शरद पूर्णिमा के चंद्र किरणों के बीच गंगा स्नान करने से मनुष्य के शरीर में अनूठी रोग प्रतिरोधी क्षमता विकसित होती है। इस खीर के सेवन से व चंद्र दर्शन से नेत्र ज्योति भी बढ़ती है । शरद पूर्णिमा का यह खीर स्वास्थ्य और दमा के रोगियों के लिए काफी लाभदायक होता है ।
- ऋतु परिवर्तन के कारण इस अवधि में पित्त के प्रकोप की आशंका रहती है इसलिए इस खीर से पित भी शांत हो जाता है । आयुर्वेद में पित, कफ, वात का औषधी, चर्म रोग, नेत्र रोग, अस्थमा का रोग, श्वास रोग का इलाज शरद पूर्णिमा के चंद्र किरणों से होता है।
- शरद पूर्णिमा ऋतु परिवर्तन के संधि का समय है, मौसम में परिवर्तन होता है जठरिग्न तेज होता है ।इसलिए भूख भी बढ़ती है । आश्विन मास की पूर्णिमा का संबंध देवताओं के वैद अश्विनी कुमार से भी है।
वाल्मीकि जयंती :-
- महर्षि वाल्मीकि जी का जन्म शरद पूर्णिमा के दिन ही हुआ था इसलिए आज वाल्मीकि जयंती भी मनाया जाता है।
- महर्षि वाल्मीकि जी ने रामायण की रचना की है । महाभारत, पुराण, धर्म इतिहास आदि प्राचीन ग्रंथो के मूल में कहीं ना कहीं यह आदि काव्य रामायण ही है ।
- भारतीय वांग्मय परंपरा में रामायण पहला काव्य प्रबंध है जिसके नायक मनुष्य हैं। महर्षि वाल्मीकि जी का नायक पूर्णतया लौकिक मनुष्य है।
- कौशल्या और दशरथ का पुत्र राम जो शील, शक्ति और मर्यादा का आदर्श प्रतिमान है, जो अपने स्वयं के पराक्रम के बल पर महान उपलिब्धयां अर्जित करता है, लेकिन जीवन में सत्य और धर्म की प्रतिस्थापना करता है।
- बाल्मीकि रामायण की महत्वपूर्ण विशेषता है कि इसका सर्व स्पर्शी सामाजिक सरोकार । बालकांड 1/100 में वर्णन है कि - इस ग्रंथ को ब्राह्मण पढ़े तो विद्वान हो जाता है, क्षत्रिय पढ़े तो राज प्राप्त करता है, वैश्य पढ़े तो व्यापार में लाभ होता है और शुद्र पढ़े तो उसे प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।
- महर्षि वाल्मीकि की घोषणा मिथ्या और भ्रामक धारणा को ध्वस्त करती है कि शुद्र को रामायण पढ़ने का केवल अधिकार ही नहीं है बल्कि पढ़ने से उसका महत्व बढ़ेगा यह कामना भी करते हैं ।
- रामायण का मूल उद्देश्य आदर्श मानव का चरित्र प्रस्तुत करना है। वाल्मीकि रामायण के सामाजिक न्याय, समानता और समदर्शिता के आदर्शों को दिखाया गया है ।
रामायण में दिखाए गए राम के गुण और व्यवहार से सामाजिक समरसता बढ़ाने में मदद मिलती है।
- रामायण में दिखाए गए राम के आदर्श शासक के गुण के प्रतीक हैं ।
- रामराज के समय में हर व्यक्त को समानता के साथ न्याय मिलता था
- राम ने पुत्र की तरह प्रजा का पालन किया
- राम राज्य में आपसी भेदभाव की स्थिति नहीं रही
- सीता को वाल्मीकि ने स्त्री शक्ति का प्रतीक के रूप में दिखाया है ।
इसलिए रामायण की रचना करने वाले महर्षि वाल्मीकि को सामाजिक समरसता और सद्भाव का प्रतीक माना जाता है। रामायण के नायक तथा उसके सेवक हनुमान ने लोगों के दुख दर्द के निवारण के लिए अपना सर्वस्व त्याग किया है।
महर्षि वाल्मीकि ऋषि बनने से पूर्व दस्यु प्रवृत्ति के थे और उनका नाम रत्नाकर था। नारद जी द्वारा ज्ञान प्राप्त कर वे दस्यु से महर्षि बन गए। इस घटना से यह पता चलता है कि व्यक्ति में विकास और उत्थान की असीम सम्भावनाएं हैं । वह नर से नारायण बन सकता है। इस दिन हम सब भी अपने दुर्गुणों को समाप्त कर उत्थान की ओर बढ़ें। यही इस उत्सव का संदेश है ।
इसी दिन भगवान कृष्ण ने ब्रज की गोपियों के साथ महारासलीला की थी। हर गोपी को ऐसा लगता था मानो भगवान श्रीकृष्ण उसके साथ रास कर रहे हैं और रास करते हुए स्त्री-पुरुष भेद समाप्त हो गया है। स्त्री-पुरुष भेद समाप्त होना समाधि की उच्चतम सीमा है। एक से अनेक होना ईश्वरीय तत्त्व है। हम भी इन गुणों को अपने अंदर लायें, यही रासलीला का भाव है ।
इसी दिन रात्रि को चन्द्रमा के प्रकाश में खीर रखकर खाने की परम्परा है। हमारे ऋषि-मुनियों ने हमें बताया कि इस दिन चन्द्रमा की किरणों में विशेष औषधि-बल आ जाता है और इस औषधि - बल को ग्रहण करने की क्षमता केवल खीर (चरू) में होती है। इस खीर को खाने से व्यक्ति वर्षभर स्वस्थ रहता है और उसकी रोग-निरोधक शक्ति बढ़ जाती है। आधुनिक विज्ञान को इस विषय पर अनुसंधान कर मानवता के कल्याण का रास्ता प्रशस्त करना चाहिए ।
हमारे हिन्दू समाज में भी अनेकों बीमारियों हैं। जिनका समय-समय पर हमारे महापुरुष इलाज करते रहे हैं। पं. पू. डॉक्टर हेडगेवार ने भी हिन्दू-समाज की सभी बीमारियों अचूक निदान ढूंढा और वह अचूक निदान इस प्रकार है-
भारत एक राष्ट्र है और वह हिन्दू राष्ट्र है ।