संघ की प्रतिज्ञा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रतिज्ञा


भारत में प्रतिज्ञा का बहुत महत्व है। हमें भीष्म प्रतिज्ञा का स्मरण है। राजा हरिशचंद्र की सत्य बोलने की प्रतिज्ञा ध्यान है। मुगलिया सल्तनत के अत्याचार के विरुद्ध महाराण प्रताप की प्रतिज्ञा को कौन भूल सकता है। छत्रपति शिवाजी महाराज ने शिव को साक्षी मानकर प्रतिज्ञा करके ‘स्वराज्य’ की नींव रखी, जिसे साकार करने में संपूर्ण समाज प्राणपण से जुट गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रतिज्ञा वह पवित्र संकल्प है, जिसे लेकर प्रत्येक स्वयंसेवक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के साथ जुड़कर आजीवन राष्ट्र सेवा और हिंदू संस्कृति के संरक्षण का व्रत लेता है। 1925 में संघ का कार्य प्रारम्भ होने के बाद प्रतिज्ञा को कार्य पद्धति में जोड़ा गया। संघ के जन्मदाता डॉ. हेडगेवार जी ने उस समय के अपने साथी कार्यकर्ताओं तथा समाज के श्रेष्ठ लोगों के साथ चर्चा-वार्ता करते हुए कार्यकर्ताओं को निरंतर प्रेरणा और समयानुकूल दिशा देने की दृष्टि से प्रार्थना और प्रतिज्ञा को संघ में अत्यन्त श्रद्धा पूर्वक स्थापित किया। आजादी से पहले की प्रतिज्ञा संघ की वर्तमान प्रतिज्ञा से भिन्न हैं। मार्च 1928 में नागपुर के निकट एक पहाड़ी पर स्वयंसेवकों को एकत्र करके, भगवाध्वज के समक्ष प्रतिज्ञा का पहला कार्यक्रम सम्पन्न कराया गया था। देश की पूर्ण स्वतंत्रता एवं विकास के लिए स्वयंसेवकों को वीरव्रती बनाने के निमित्त आयोजित इस प्रथम कार्यक्रम में 99 स्वयंसेवकों ने प्रतिज्ञा की थी। जिसमें “मैं हिन्दूराष्ट्र को स्वतंत्र कराने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का घटक बना हूँ”, था। 


प्रतिज्ञा का मुख्य उद्देश्य और भाव:

  • ईश्वर और पूर्वजों का स्मरण: इस प्रतिज्ञा में सर्वशक्तिमान परमेश्वर को साक्षी मानकर पूर्वजों द्वारा दिखाए गए आदर्शों पर चलने का संकल्प लिया जाता है।
  • समाज व संस्कृति का उत्थान: प्रतिज्ञा का मुख्य लक्ष्य हिंदू धर्म, संस्कृति और समाज की रक्षा करना तथा संपूर्ण राष्ट्र को परम वैभव तक पहुंचाना है।
  • समर्पण: स्वयंसेवक निस्वार्थ भाव से अपना तन, मन और धन देश और समाज के लिए समर्पित करने का आजीवन वचन देता है।

प्रतिज्ञा ग्रहण कार्यक्रम


अर्हताः 

  1. प्रतिज्ञा लेने वाले स्वयंसेवक की आयु 17 वर्ष से अधिक तथा संघ आयु 5 वर्ष से अधिक हो ।
  2. प्रतिज्ञा लेने वाले स्वयंसेवक के मन में निरंतर संघ कार्य करने की इच्छा शक्ति, क्षमता, समझदारी, संघकार्य में पूर्ण निष्ठा एवं भक्ति आवश्यक है।
  3. प्रतिज्ञा क्या है और क्यों लेनी चाहिए ? प्रतिज्ञा लेने वाले स्वयंसेवक से पूर्व में ही इस विषय में किसी जिम्मेदार कार्यकर्त्ता द्वारा व्यक्तिगत बात हो जानी चाहिए।

सूचना: 

  1. कार्यक्रम का स्थान स्वच्छ, सुंदर हो, संख्या के प्रमाण में कक्ष में होना चाहिए ।
  2. वातावरण मंगलमय, पवित्र एवम प्रेरणादायी हो ।
  3. सादगीपूर्ण सुसज्जित ध्वजस्थान, भारत माता, प. पू. डॉक्टर जी, प. पू. श्री गुरुजी के चित्र हों ।
  4. ध्वज धुला हुआ व प्रेस किया हुआ हो, ध्वज पर कम वजन वाली माला लगी हो ।
  5. ध्वज का पूजन करने के लिए पुष्प आदि की योग्य व्यवस्था हो ।
  6. कार्यक्रम मे संख्या मर्यादित होना आवश्यक है क्योकि जब तक सबकी प्रतिज्ञा नहीं हो जाती है तब तक सभी को खड़े रहना होता है।
  7. प्रतिज्ञा, समर्पण, तत्तविनष्ठा व ध्येयनष्ठां का विषय ठीक से समझा सके ऐसा बौद्धिककर्ता हो।
  8. प्रतिज्ञा दक्ष से सम्मानित अधिकारी द्वारा ही कराई जाती है । यदि किसी स्थान पर दक्ष से सम्मानित अधिकारी नहीं है तो वहाँ मा. प्रान्त संघचालक जी द्वारा किसी भी दायित्ववान, समझदार कार्यकर्ता को प्रणामाधिकारी नियुक्त किया जा सकता है । वह कार्यकर्त्ता केवल उसी कार्यक्रम मात्र के लिए ही दक्ष द्वारा सम्मानित अधिकारी / प्रणाम अधिकारी माना जाएगा ।
  9. यदि दक्ष द्वारा सम्मानित अधिकारी तो है परन्तु उन्हें प्रतिज्ञा कंठस्थ नहीं है तो जिला या ऊपर के स्तर के जिस कार्यकर्त्ता को प्रतिज्ञा कंठस्थ है वह भी प्रतिज्ञा करवा सकता है । परन्तु प्रणाम तो दक्ष से सम्मानित अधिकारी को ही करना है ।
  10. कार्यक्रम में उपस्थित सभी स्वयंसेवक पदवेश छोड़कर शेष गणवेश में या मंगलवेश व गणवेश की टोपी में रहेंगे ।
  11. ध्यान रहे कि मुख्यशिक्षक व प्रतिज्ञा करवाने वाले का भी पूर्व में ही प्रतिज्ञत होना अनिवार्य है।
  12. प्रतिज्ञा मातृभाषा में लेनी चाहिए। जिस प्रान्त में जो भाषाएं बोली जाती है उन भाषाओं में प्रतिज्ञा का शुद्ध अनुवाद उपलब्ध रहना चाहिए।

अनुक्रम :

  1. शाखा प्रारंभ ।
  2. उपिवश ।
  3. प्रस्तावना एवं अधिकारी एवं बौद्धिककर्ता का परिचय ।
  4. एकल गीत (विषय के अनुरूप) ।
  5. वक्ता द्वारा विषय का प्रतिपादन ।
  6. उतिष्ठ व आरम ।
  7. प्रतिज्ञा करने वाला स्वयंसेवक ध्वज के सामने आकर ध्वजप्रणाम करेगा, फिर ध्वज का पुष्पार्चन करके ध्वजप्रणाम के स्थित में ध्वज के सन्मुख खड़ा रहेगा ।
  8. मुख्यशिक्षक सभी को संघ दक्ष कराएगा ।
  9. अब प्रतिज्ञा कराने वाले अधिकारी प्रतिज्ञा करवाएंगे ।
  10. भारत माता की जय के पश्चात् मुख्यशिक्षक सभी को आरम कराएगा। इस समय प्रतिज्ञा करने वाला स्वयंसेवक पुनः ध्वजप्रणाम करेगा, तत्पश्चात् अधिकारी को प्रणाम करके अपने स्थान पर जायेंगा।
  11. जब तक सभी की प्रतिज्ञा संपन्न नहीं हो जाती तब तक सभी स्वयंसेवक मुख्यशिक्षक की आज्ञा पर दक्ष व आरम करेंगे ।
  12. अंत मे प्रार्थना व ध्वजावतरण । इसके बाद प्रसाद वितरण भी हो सकता है।

प्रतिज्ञा करवाने वाले की सहायतार्थ प्रतिज्ञा के कुछ छोटे-छोटे भाग किये हैं ।

सर्वशक्तिमान श्री परमेश्वर - तथा अपने पूर्वजों का स्मरण कर - मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि - अपने पवित्र हिन्दू धर्म, - हिन्दू संस्कृति, - तथा हिन्दू समाज का संरक्षण कर - हिन्दुराष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति - करने के लिए - मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का - घटक बना हूँ । - संघ का कार्य - मैं प्रामणिकता से, - निःस्वार्थ बुद्धि से - तथा तन-मन-धन पूर्वक करूंगा, - और इस व्रत का - मैं आजन्म पालन करूंगा । - भारत माता की जय ।

संघ प्रतिज्ञा पर बौद्धिक हेतु कुछ विशेष बिंदु

  • श्रीराम को भगवान बनाने में उनके माता-पिता के बजाय प्रतिज्ञा का योगदान। (श्री राम द्वारा की गई प्रतिज्ञा- निशिचर हीन…..)।
  • अच्छे कार्य करते समय प्रतिज्ञा सम्बल बनती हैं। भीष्म, प्रताप, शिवाजी, भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद और सुभाष चन्द्र बोस प्रतिज्ञा से प्राप्त सम्बल के कारण ही अपने उद्देश्य को प्राप्त कर पाये।
  • हम प्रतिज्ञा का प्रारम्भ सर्वशक्तिमान श्री परमेश्वर से करते हैं। प्रतिज्ञा में हम अपने पूर्वजों का स्मरण भी करते हैं।
  • प्रतिज्ञा व्यक्तिगत संकल्प हैं। यह केवल कण्ठस्थ ही नहीं हृदयस्थ भी हों।
  • प्रतिज्ञा मैं हम हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति तथा हिन्दू समाज के संरक्षण का व्रत लेते हैं न कि रक्षा का। (गाय द्वारा छोटे बच्चे के संरक्षण का उदाहरण)
  • हिन्दू राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति की प्रतिज्ञा। यह सर्वांगीण उन्नति ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः….’’ के भाव से ही होगी।
  • संघ का कार्य प्रमाणिकता से करूगाँ, प्रमाणिकता का अर्थ हैं जो कहे वहीं करें।
  • मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का घटक बना हूँ ना की सदस्य (शिकंजी का उदाहरण)
  • संघ का कार्य निःस्वार्थ बुद्धि से करूँगा। – स्वयंसेवक के मन में किसी प्रकार का लोभ नहीं आना चाहिए। (हनुमान जी का उदाहरण)
  • संघ का कार्य तन-मन-धन पूर्वक करूगाँ। इसमें सर्वस्व समर्पण का भाव निहित हैं।
  • संघ का कार्य आजन्म करूगाँ न कि आजीवन। (रामप्रसाद बिस्मिल का उदाहरण)।
  • हमारे द्वारा की गई प्रतिज्ञा की फलश्रुति भारत माता की जय से होगी।

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