डॉ. हेडगेवार जी के जीवन के संस्मरण

डॉ. हेडगेवार जी के जीवन के संस्मरण


अभिनव संगठन - शिल्पी

डॉ. हेडगेवार के जीवनकाल में अन्य महापुरुषों की भाँति उनकी प्रसिद्धि नहीं के बराबर थी। इतना ही नहीं बल्कि सन् 1940 में जब 52वे वर्ष की अल्पायु में ही उनके बलिष्ठ शरीर का असमय अन्त हो गया और जब उनके द्वारा 1925 में स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश के प्रायः सभी प्रमुख प्रान्तों में पहुँच गया था तो भी संघ क्षेत्र के बाहर उनकी प्रसिद्धि नहीं थी। कदाचित यह कहना अतिशयोक्ति पूर्ण बात नहीं होगी कि आज जब भारत और उसके बाहर विदेशों में भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम लोगों के लिए उत्सुकतापूर्ण चर्चा का विषय है, उसके महान संस्थापक के बारे में कम ही लोगों को सही जानकारी होगी। आखिर ऐसा क्यों है?

अभी तक डॉ० हेडगेवार जी के बारे में जितनी जानकारी प्रकाश में आयी है। उससे यह तो निर्विवाद रूप से सिद्ध है कि वे पूर्णतया प्रसिद्धिपरांगमुख थे। अपने बारे में भारतीय सन्त परम्परा की भाँति वे कोई चर्चा नहीं करते थे और न ही अपने सहयोगियों से उसके बारे में कोई चीज प्रकाशित करवाना चाहते थे । उनके द्वारा स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिसको आज 100 वर्ष हो गये हैं और जो भारतीय राष्ट्र जीवन के सभी क्षेत्रों तथा सभी आयु एवं वर्गों के लोगों को व्यापक रूप से प्रभावित कर रहा है, डॉ. हेडगेवार की सच्ची आत्मकथा है।

डॉ. हेडगेवार की विशिष्ट महानता किस बात में थी, जो उन्हें अन्य प्रसिद्धि पुरुषों से कुछ भिन्न सिद्ध करती है, यह विचार का विषय है। महानता को नापने का कोई सुनिश्चित स्थूल मापक नहीं है। सामान्यता सभी महापुरुषों में एक बात समान रूप से पायी जाती है कि वह अपने निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति प्राण के मार्ग में आने वाली सभी प्रकार की बाधाओं एवं विपत्तियों की परवाह न करते हुए और पूर्ण त्याग एवं समर्पित भाव से अग्रसर होते हैं। इनमें से कुछ अपा लक्ष्य प्राप्त करने में सौभाग्यशाली होते हैं तो कुछ का लक्ष्य उनके जीवनकाल में नहीं अपितु उनके जीवन के बाद आगामी पीढ़ियाँ सफल देखती है।

हम जानते हैं कि महात्मा गांधी अपने जीवनकाल में ही प्रसिद्धि के शिखर पर पहुँच गये थे। रूस में लेनिन को भी ऐसा ही यश एवं गौरव प्राप्त हुआ। चीन में माओ त्से तुंग को भी जीवनकाल में ही सर्वत्र यश एवं प्रसिद्धि प्राप्त हुई थी। किन्तु डॉ० हेडगेवार की स्थिति इन सबसे उनके जीवनकाल में भिन्न थी, यह ऊपर बताया जा चुका है। अब इसका उल्टा देखिये। आज भारत में गांधी जी के मार्ग पर चलने वाले उनके कितने सच्चे अनुयायी हैं, लेनिन का रूस कहाँ जा रहा है, माओ का नाम तो अब चीन में घोर आलोचना का विषय हो गया है।

योगी अरविन्द के शिष्य दिलीप कुमार राय ने एक पुस्तक लिखी है। जिसका शीर्षक है एमंग द ग्रेट इसमें उन्होंने एक स्थान पर फ्रांस के महान मनीषी रोम्यां रोलां से अपनी वार्ता का उल्लेख किया है। इस वार्ता में रोम्यां रोलां ने एक प्रसंग में कहा है कि यह सत्य है कि विश्व के सभी प्रमुख व्यक्ति यदि कुछ कर सकें तो वह केवल अपनी प्रबल आशा एवं ज्वलन्त आस्था के कारण। किन्तु उनका कहना है कि यह भी विचारणीय है कि उनके बाद आज कितने लोग उन महापुरुषों से जीवन्त प्रेरणा लेते हैं, इतना ही नहीं तो कितने लोगों की आज बुद्ध या ईसा मसीह में सच्ची श्रद्धा है। अन्य छोटे महापुरुषों की तो बात ही नहीं, दूसरे शब्दों में रोलां का यह भाव प्रतीत होता है कि किसी व्यक्ति की महानता केवल उसके विचारों एवं आदर्शों की प्रसिद्धि पर निर्भर नहीं करती। बल्कि वह इस पर निर्भर करती है कि उसके अनुयायी कहलाने वाले कितने लोग कितनी श्रद्धा एवं सच्चाई के साथ उनके बताये आदर्शों पर चलते हैं।
हमें लगता है कि डॉ. हेडगेवार की महानता इसी विशेषता में थी । एक शताब्दी पूर्व उनका जन्म हुआ था और आधी शती उनके देहावसान को हो चुकी है। किन्तु आज देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 30 हजार शाखाओं पर प्रतिदिन आने वाले लाखों स्वयंसेवक और इनके अतिरिक्त संघ के करोड़ों समर्थक क्या डॉ० हेडगेवार जी के बताये हुए नि:स्वार्थ राष्ट्र सेवा की भावना से जो कार्य करते हैं क्या वह इसका ज्वलन्त प्रमाण नहीं है कि जैसे-जैसे समय बीतता जाता है डॉ० हेडगेवार की प्रासंगिकता बढ़ती जा रही है और उनके जीवन काल में जिन्हें लोग बहुत कम जानते थे अब उनके बारे में अधिकाधिक जानने को उत्सुक हैं।

इतिहास यह भी बताता है कि प्राय:काल विशेष में विचारकों, मनीषियों एवं महापुरुषों ने जिन आदर्शों के लिए प्रचार और कार्य किया उनके जीवन के बाद स्थिति बिल्कुल उनकी अपेक्षाओं के विपरीत हो गयी । महात्मा गांधी के एक प्रमुख प्रेरणाश्रोत श्री टाल्सटाय ने रूस में निर्धनों के उत्थान का जो स्वप्न देखा था क्या रूसी क्रान्ति के बाद वह पूरा हआ इसी प्रकार राबस पीयर एवं वाल्टेयर ने फ्रान्सीसी क्रान्ति के जो आदर्श प्रतिपादित किया था क्या नेपोलियन के उदय ने उनका शीर्षासन नहीं कर दिया था, क्या आयरलैण्ड में ही वेलरा के स्वप्न पूरे हुये, इटली में मेजिनी एवं गैरीबाल्डी के आदर्शों की आज वहाँ चर्चा भी होती है, सच्चे अनुयायी होने की तो बात कौन कहे ?

इतिहास के इस परिप्रेक्ष्य में जब हम संघ-संस्थापक डॉ० हेडगेवार की कर जीवन, विचारों, आदर्शों एवं कृतित्व पर विचार करते हैं तो हमें क्या दिखाई देता है? उनके जीवनकाल में संघ का प्रचार-प्रसार जहाँ प्रमुख प्रान्तों के कुछ नगरों तक ही हो पाया था वहाँ आज देश के लगभग ४२८ जिलों में से प्रायः अधिसंख्य स्थानों पर डॉ० हेडगेवार का जीवन सन्देश पहुंच चुका है। इतना ही नहीं तो देश के बाहर भी दर्जनों देशों में विभिन्न हिन्दू संगठनों के माध्यमों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके संस्थापक का सन्देश वहाँ रहने वाले प्रवासी हिन्दुओं को एकता सूत्र में आबद्ध कर उन्हें हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति और भारत के सनातन जीवन मूल्यों से जोड़े रखने का महत्त्वपूर्ण कार्य कर रहा है।

डॉक्टर साहब जी के जीवनकाल में जितने लोग उनके द्वारा प्रतिपादित हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा को स्वीकृत कर चुके थे आज उससे यह संख्या सहस्र गुना बढ़ गयी है। देश-विदेश के बड़े-बड़े राजनेता, प्रशासक, न्यायविद, पत्रकार, साहित्यकार, विचारक आदि अब समय-समय पर यह उद्घोष करते सुने जाते हैं कि भारत में चूँकि बहुमत हिन्दुओं का है इसलिए व्यवहार में यहाँ हिन्दू आदर्शों का आदर होना ही चाहिए और इस अर्थ में यह हिन्दू राष्ट्र ही है हिन्दू संस्कृति सहिष्णुता पर आधारित है और इतिहास साक्षी है कि हिन्दुओं ने कभी किसी अन्य धर्मावलम्बी को उत्पीडित नहीं किया। इतना ही नहीं तो उन्हें सदैव अपने यहां उदारतापूर्वक शरण दी है। अत: हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा से अन्य धर्मावलम्बिया को शिकायत होने का कोई कारण नहीं।

डॉ. हेडगेवार के जीवन कार्य एवं आदशों की इस उत्तरोत्तर सफलता और उनके अनुयायियों एवं समर्थकों की सतत संख्यावृद्धि से क्या सिद्ध होता है और वह भी उनके देहावसान के 86 वर्षों बाद, जबकि दूसरी ओर हम जानते है कि गांधी जी अपने जीवनकाल में ही यह कहने लगे थे कि हे भगवान, मेरी कोई नहीं सुनता। कहते हैं कि गौतम बुद्ध और ईसा मसीह भी जीवन के अन्तिम काल में कुछ निराश एवं खिन्न थे। स्वामी विवेकानन्द के बारे में भी बताया जाता है कि अपने महा प्रस्थान से पूर्व एक बार उनके मुँह से यह वाक्य निकला था कि समाज को बदलने वाला मैं कौन होता हूँ, जो माँ की इच्छा होगी, वही होगा ।

किन्तु दूसरी ओर डॉक्टर जी ने अपने देहान्त से पूर्व 1940 के नागपुर में होने वाले संघ- शिक्षा वर्ग में भारत के प्रायः सभी प्रान्तों का प्रतिनिधित्व देखकर सोत्साह कहा था कि मैं आज अपने सामने सम्पूर्ण भारत की छोटी-सी प्रतिमा देख रहा हूँ।

संघ की शाखाओं के अतिरिक्त विश्व हिन्दू परिषद, वनवासी कल्याण आश्रम, विभिन्न सेवा प्रकल्पों, विद्यार्थी परिषद, भारतीय मजदूर संघ, भारतीय किसान संघ, विद्या भारती आदि विभिन्न संगठनों के माध्यम से जो कार्य देश भर में और देश के बाहर हो रहे हैं क्या उनके मूल में डॉ. हेडगेवार जी के विचार एवं आदर्श प्रेरणा का काम नहीं कर रहे हैं? उनके अपूर्व व्यक्तित्व एवं कृतित्व के क्या ये जीवन्त साक्षी नहीं हैं?


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