श्री गुरुजी जी के जीवन के संस्मरण

श्री गुरुजी जी के जीवन के संस्मरण

मैं नहीं, तू ही

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी (श्री माधवराव सदाशिव गोलवलकर) के महान व्यक्तित्व की अनेक विशेषताओं का स्मरण आता है। बातचीत में प्रायः वे यह कहा करते थे कि तुम लोग विद्वान् हो और मैं तो कुछ नहीं जानता। किन्तु जब किसी विषय पर चर्चा छिड़ जाती तो वे अपने ज्ञान से हम लोगों को आश्चर्यचकित कर देते थे।

सन 1949-50 की बात है। मैं उन दिनों नागपुर से प्रकाशित 'युगधर्म' साप्ताहिक के सम्पादन कार्य से सम्बद्ध था। श्री गुरुजी जब नागपुर होते थे। मैं स्वयं उस सप्ताह का अंक लेकर उनके पास जाता था जिससे कि उनके मार्गदर्शन का लाभ मिल सके। स्व० बालासाहब देवरस का भी मेरे लिए यही निर्देश था। जहाँ तक मुझे स्मरण है, 26 जनवरी 1950 को प्रकाशित युगधर्म साप्ताहिक का गणतन्त्र अंक लेकर मैं गरुजी के पास गया। उसके प्रथम पृष्ठ पर भारतमाता का चित्र छपा था। मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था कि चित्रकला के क्षेत्र में गुरुजी को इतनी सूक्ष्म जानकारी होगी। उन्होंने चित्र देखते ही कहा कि पैर की उँगली दोषपूर्ण है। जिस प्रकार की उँगली चित्रकार ने बनायी है वह वीरांगना की मानी गयी है। माता के पैर की उँगली ऐसी नहीं होनी चाहिए। उनकी दृष्टि अचूक और पैनी रहती थी।

एक दूसरी घटना “युगधर्म" के बाल स्तम्भ के अन्तर्गत मैंने कच और देवयानी की कथा लिखी थी। भूलवश पत्र में कच के स्थान पर घटोत्कच छप गया था। गुरुजी नागपुर में थे। मैं पहले से ही काफी डरा हुआ था और अंक लेकर जब उनके पास पहुँचा तो भगवान से प्रार्थना कर रहा था कि गुरुजी का ध्यान उस त्रुटि की ओर न जाय। किन्तु उन्होंने जैसे ही अंक के पृष्ठ पलटे तुरन्त बोल उठे कहो घटोत्कच, क्या हाल है? मैं यह सुनकर पानी-पानी गया ।

सन् 1961 में लखनऊ में संघ शिक्षा वर्ग लगा था। मैं उसमें पर्यवेक्षक था और हमारे पर्यवेक्षक प्रमुख थे श्री इन्द्रप्रकाश रस्तोगी। वे लखीमपुर जनपद के प्रसिद्ध डी०एस० कालेज के कुशल प्रधानाचार्य थे। उनकी स्मरण शक्ति काफी अच्छी थी। अपने सैकड़ों छात्रों के नाम उन्हें स्मरण रहते थे। रात्रि में श्री गुरुजी वर्ग में अधिकारियों की बैठक ले रहे थे। उन्होंने वर्ग में उपस्थित स्वयंसेवकों की संख्या के विषय में विस्तार से पूछताछ की तो रस्तोगी जी चकरा गये और मुझे स्मरण है कि रस्तोगी जी गुरुजी को सन्तोषपूर्ण उत्तर नहीं दे पाये ।

उनकी दूर दृष्टि देखिये। सन् 1853 की बात है। स्व० डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के पंजाब से जम्मू-कश्मीर को जाने का समाचार जब श्री गुरुजी को बताया गया तो वे विचलित हो गये और निकट बैठे शायद श्री दीनदयाल जी से कहा कि बहुत बड़ी भूल हो गयी। उन्हें इस प्रकार असुरक्षित काश्मीर नहीं भेजा जाना चाहिए था और हम जानते हैं कि उनकी शंका निर्मूल नहीं थी। अन्त में मुखर्जी का शव ही वहाँ से वापस आया, यह सर्वविदित है।

इसी प्रकार सन् 1965 के भारत-पाक युद्ध की समाप्ति के बाद जब स्व० प्रधानमन्त्री श्री लाल बहादुर शास्त्री समझौता वार्ता के लिए रूस के आमन्त्रण पर मास्को गये तो उस समय भी गुरुजी ने उन्हें वहाँ न जाने की बात अपने कार्यकर्ताओं के बीच कही थी। गुरुजी का यह भी कहना था कि शक्तिशाली पक्ष की मध्यस्थता भी खतरनाक होती है। इस घटना में भी हम जानते हैं कि श्री गुरुजी का मत सही निकला। श्री शास्त्री जी को अपने प्राण गंवाने पड़े और भारत को उस समझौता वार्ता से कोई लाभ नहीं हुआ।

उनमें व्यक्तियों और परिस्थितियों को पहचानने की अदभुत क्षमता थी। नवम्बर 1966-67 में दिल्ली में गोहत्या बन्दी के लिए एक विशाल प्रदर्शन आयोजित किया गया था। जिसमें संघ परिवार के लोग भी सम्मिलित थे। कुछ शरारती तत्वों और तत्कालीन सरकार की साजिश के कारण यहाँ गोली काण्ड हआ। गोभक्तों को बदनाम करने की सत्तारूढ़ लोगों की योजना थी। प्रचारतन्त्र के कुछ लोगों ने भी प्रदर्शनकारियों को बदनाम किया जब कि वे निर्दोष थे। कछ समाचार पत्रों ने यहाँ तक छाप दिया था कि श्री गुरुजी उस दिन के कार्यक्रम स्थल पर मंच पर उपस्थित थे। जबकि वास्तविकता यह थी कि श्री गुरुजी उस दिन यवतमाल (विदर्भ) में थे। यह गुरुजी की दूरदर्शिता ही थी जिसमें उस दिन उन्हें और संघ को इस षड्यन्त्र का शिकार होने से बचाया।

हम लोग जानते हैं कि श्री गुरुजी विज्ञान के छात्र और बाद में उसी विषय के प्राध्यापक हुए । प्राध्यापक पद का अल्पकाल पूर्ण कर वे संघ कार्य से प्रगाढ रूप से जुड़ गये और नागपुर वापस आ गये। इसी अवधि में उन्होंने नागपुर में विधि स्नातक परीक्षा भी उत्तीर्ण की। जैसा कि मैंने कहा कि मूलतः वे विज्ञान के छात्र थे किन्तु साहित्य, संगीत, दर्शनशास्त्र, प्राचीन वाङम में उनका ज्ञान सुनकर हम लोग आश्चर्य में पड़ जाते थे। मैंने अंग्रेजी साहित्य में एम ए था किन्तु श्री गुरुजी के मुख से शेक्सपियर के नाटकों और चार्ल्स डिकेन्स के उपन्यासों तथा अन्य आंग्ल लेखकों के अवतरण सुनकर मुझे भी ज्ञान प्राप्त होता था। भारतीय स्मृतिकारों की बात चली तो देवलस्मृति की चर्चा मैंने पहली बार उन्हीं के मुख से सुनी । जहाँ तक मुझे स्मरण आता है, स्व० पण्डित दीनदयाल उपाध्याय को उनके अनेक लेखों और एकात्म मानववाद की आधार भूमि श्री गुरुजी के संस्कृत, मराठी आदि वाङ्मय के गहन ज्ञान से प्राप्त हुई थी।

स्वामी विवेकानन्द के गुरु भाई स्वामी अखण्डानन्द से उन्होंने दीक्षा ली थी। अद्वैत की साधना के बाद भी श्री गुरुजी का सम्पर्क संघ-संस्थापक डॉ. हेडगेवार से जितना प्रगाढ़ होता चला गया उतना ही वे डॉक्टर जी के प्रति भक्तिभाव से आप्लावित होते गये और अन्त में हेडगेवार जी के स्वर्गवास के बाद उनके सुयोग्य उत्तराधिकारी बने । सन 1940 में उन्होंने संघ के द्वि तीय सरसंघचालक का गुरुत्तर दायित्व सम्भाला और तैंतीस वर्ष तक अपने महाप्रयाण तक उसका श्रेष्ठ निर्वहन किया। भारतवर्ष में शायद ही कोई ऐसा सार्वजनिक व्यक्ति मिले जिसने तैंतीस वर्ष तक निरन्तर प्रतिवर्ष सम्पूर्ण देश का प्रवास किया हो और जो सत्ता में न रहा हो। इसी प्रकार सम्पूर्ण देश के छोटे-बड़े संघ कार्यकर्ताओं और संघेत्तर व्यक्तियों का भी अपने हस्तलिखित पत्रों के माध्यम से समुचित मार्गदर्शन करने वाला भी कदाचित श्री गुरुजी के अतिरिक्त कोई दूसरा न मिले। हाँ, गुरुजी से पूर्व पूज्य महात्मा गांधी ने अवश्य यह कार्य किया।

सन् 1948 में नेहरू सरकार ने महात्मा गांधी की घृणित हत्या के षड्यन्त्र में सम्मिलित होने का झूठा आरोप लगाकर संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। श्री गुरु जी के कुशल नेतृत्व में लगभग डेढ वर्ष संघर्ष करने के बाद संघ उस अग्नि परीक्षा में निर्दोष सिद्ध हुआ और जनता के समक्ष और अधिक सबल एवं यशस्वी होकर प्रकट हुआ।

इसी प्रकार श्री गुरुजी के नेतृत्व की एक और परीक्षा हुई। जुलाई सन् 1949 में संघ पर से प्रतिबन्ध सरकार ने विवश होकर हटा लिया और संघ कार्य सम्पूर्ण देश में पुन: उत्साहपूर्वक प्रारम्भ हो गया। इस काल-खण्ड में अनेक पुराने एवं प्रमुख कार्यकर्ताओं की ओर से गुरुजी से यह कहा जाने लगा कि अब संघर्ष को प्रत्यक्ष राजनीति में कार्य करना चाहिए । श्री गुरुजी ने दृढ़ता से इस मार्ग को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और स्पष्ट घोषणा की कि मैं संघ को उसी मार्ग पर चलाऊँगा जिस पर चलने का निर्देश हेडगेवार जी ने मुझे दिया था। उनकी इस दुढ़ एवं स्पष्ट घोषणा ने अन्त में शंकित एवं विचलित कार्यकर्ताओं को अपने पथ पर सुस्थिर रहने का सम्बल प्रदान किया। श्री गुरुजी अपनी बैठकों और वार्ताओं में स्वयंसेवकों के निजी जीवन की शचिता पर अत्यधिक बल देते थे। राष्ट्रीय चारिचय पर तो संघ प्रारम्भ से ही जोर देता रहा है। अनुशासन के पालन का महत्त्व भी वे बार-बार रेखांकित करते थे। इन गुणों के स्खलन को वे सहन नहीं करते थे। यही कारण था कि उन्होंने कई प्रसिद्ध एवं प्रमुख कार्यकर्ताओं, यहाँ तक कि प्रान्त प्रचारकों के स्तर वाले व्यक्तियों तक को वे स्खलित होने पर संघ कार्य दायित्व से मुक्त कर दिया था। एक बार ‍ धर्मयुग साप्ताहिक ( अब बन्द) ने देश के प्रसिद्ध व्यक्तियों से उनके जीवन के ध्येय वाक्य (मोटो) माँगे थे। श्री गुरुजी ने पत्र को जो ध्येय वाक्य भेजा था, वह था मैं नहीं, तू ही हमें भी इसी ध्येय वाक्य को मन्त्र के रूप में हृदयस्थ करना चाहिए और हम जानते हैं कि हजारों संध- कार्यकर्ताओं ने इस मन्त्र को अपने जीवन में चरितार्थ भी किया है।


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