संघ से जुड़े कुछ अहम सवाल और उनके जवाब
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 2025 में अपनी स्थापना के 100 साल पूरे किए। इस एक सदी में संघ की सोच और उसके काम हमेशा चर्चा में रहे। 2014 में बीजेपी सरकार बनने के बाद संघ का राजनीतिक प्रभाव काफी बढ़ गया है। संघ के लक्ष्य, जैसे हिंदू राष्ट्र बनाना और शाखाओं के जरिए लोगों को जोड़ना, स्वयंसेवक संवाद पोर्टल पर बताए गए हैं। वहीं इसके विवाद, राजनीतिक रिश्तों और अल्पसंख्यकों पर नजरिया बीबीसी और अमर उजाला जैसी साइट्स पर मिलते हैं। संघ पर आजादी की लड़ाई से दूरी और तिरंगे के विरोध के आरोप लगते रहे हैं। कुछ लोग इसे सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने वाला और ब्राह्मणवादी वर्चस्व वाला संगठन मानते हैं।
आइए आरएसएस से जुड़े कुछ अहम सवालों को देखते हैं।
प्रश्न 1: आरएसएस क्या है और इसकी स्थापना कब हुई?
उत्तर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जिसे संघ भी कहते हैं, एक हिंदू राष्ट्रवादी संगठन है। इसकी स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर, महाराष्ट्र में की थी। हेडगेवार पहले कांग्रेस में थे, लेकिन विचारों के मतभेद के कारण उन्होंने पार्टी छोड़ दी और संघ की स्थापना की। (स्रोत: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का परिचय, माधव गोविन्द वैद्य, पेज 11-13)
संघ को अक्सर दुनिया का सबसे बड़ा स्वैच्छिक या वॉलंटरी संगठन कहा जाता है, संघ को दुनिया का सबसे बड़ा स्वैच्छिक (वॉलंटरी) संगठन माना जाता है। हालांकि सदस्यों की कोई आधिकारिक संख्या नहीं है, पर संघ के एक नेता के अनुसार इसमें करीब एक करोड़ स्वयंसेवक हैं। आरएसएस खुद को एक गैर-राजनीतिक सांस्कृतिक संस्था कहता है, लेकिन यह भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के मार्गदर्शक के रूप में काम करता है।
प्रश्न 2: आरएसएस के मुख्य उद्देश्य और लक्ष्य क्या हैं?
उत्तर: आरएसएस खुद को एक सांस्कृतिक संगठन कहता है। इसका लक्ष्य भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना है, हिंदू का मतलब किसी पूजा पद्धति से नहीं, बल्कि एक जीवन-दृष्टि और जीवन-शैली (Way of Life) है। जिसका मक़सद हिंदू संस्कृति, हिंदू एकता और आत्मनिर्भरता के मूल्यों को बढ़ावा देना है। संघ का कहना है कि वो राष्ट्र सेवा और भारतीय परंपराओं और विरासत के संरक्षण जैसे विषयों पर ज़ोर देता है। मौजूदा सरसंघचालक मोहन भागवत कहते हैं कि संघ एक "कार्य प्रणाली है और कुछ नहीं"। उनके मुताबिक़, आरएसएस "व्यक्ति निर्माण का काम करता है"। (भविष्य का भारत - संघ का दृष्टिकोण, पेज 19)।
संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर अपनी किताब 'आरएसएस: 21वीं सदी के लिए रोडमैप' (पेज 9) में लिखा है कि "संघ समाज पर शासन करने वाली एक अलग शक्ति नहीं बनना चाहता और उसका मुख्य उद्देश्य समाज को मज़बूत करना है।" उन्होंने इसी किताब में यह भी लिखा हैं कि 'संघ समाज बनेगा' एक नारा है, जो आरएसएस में बार-बार लगाया जाता है।
प्रश्न 3: शाखा की संघ क्या हैं?
उत्तर: शाखा संघ की सबसे छोटी आधारभूत संगठनात्मक इकाई है, जो उसे ज़मीनी स्तर पर एक बड़ी मौजूदगी देती है। शाखा वो जगह है, यहाँ स्वयंसेवकों को शारीरिक और वैचारिक प्रशिक्षित DIYAकिया जाता है। ज्यादातर शाखाएं रोज सुबह या शाम को लगती हैं, जबकि कुछ जगहों पर ये हफ्ते में कुछ दिन ही चलती हैं। आरएसएस के अनुसार, भारत में 83 हज़ार से ज़्यादा शाखाएं हैं। यहाँ खेल, व्यायाम और टीमवर्क की गतिविधियां होती हैं। सदस्यों को मार्चिंग और आत्मरक्षा भी सिखाई जाती है। इसके साथ ही शाखा में हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्रवाद जैसे मूल सिद्धांतों की शिक्षा दी जाती है। आरएसएस देश भर में अपनी उपस्थिति बढ़ाने और बनाए रखने के लिए शाखाओं पर ही निर्भर करता है।
प्रश्न 4: संघ केवल हिन्दुओं के संगठन की ही बात क्यों करता है? क्या संघ एक धार्मिक संगठन है?
उत्तर : संघ खुद को धार्मिक या सांप्रदायिक नहीं मानता। यह एक सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी संगठन है जो हिंदू जीवन-दृष्टि का प्रसार करता है। यहाँ हिंदू शब्द का अर्थ किसी खास पूजा पद्धति, पंथ या मजहब से नहीं है। हिंदू होना एक जीवन जीने का तरीका है। सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है कि हिंदू धर्म कोई रिलिजन नहीं बल्कि जीने की एक पद्धति (Hinduism is not a religion but way of Life) है। जैसे सत्य एक ही है पर उसे पाने के रास्ते अलग हो सकते हैं। यह सोच भारत की पहचान है।
एक ही चेतना अलग-अलग रूपों में दिखती है। इसी वजह से विविधता में एकता भारत की मूल सोच है। यह हिन्दू जीवन दृष्टि है। जो व्यक्ति भारत के इतिहास को अपना मानता है, वह व्यक्ति जो यहाँ के मूल्यों को अपने आचरण में उतारता है और इन जीवन मूल्यों की रक्षा के लिए त्याग करता है, वह हिंदू है। फिर उसका मजहब या उपासना पंथ चाहे जो हो।
प्रश्न 5: संघ का सदस्य कौन बन सकता है? संघ की सदस्यता की प्रक्रिया क्या है?
उत्तर: कोई भी हिंदू पुरुष संघ का सदस्य बन सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कोई औपचारिक सदस्यता नहीं होती है। जो लोग आरएसएस की शाखाओं में आते हैं, उन्हें स्वयंसेवक कहा जाता है। कोई भी हिंदू पुरुष अपने पास की शाखा से संपर्क करके स्वयंसेवक बन सकता है। इसके लिए कोई फॉर्म नहीं भरना पड़ता। कोई शुल्क या पंजीकरण फॉर्म या आधिकारिक आवेदन भी नहीं देना होता। जो व्यक्ति सुबह या शाम की दैनिक शाखा में आना शुरू करता है, वह स्वयंसेवक बन जाता है।
अगर किसी को पास की शाखा या स्वयंसेवक की जानकारी नहीं है, तो वह वेबसाइट पर एक फॉर्म भर सकता है। इसके बाद संघ उसे नजदीकी शाखा की जानकारी दे देता है।
प्रश्न 6: क्या महिलाएँ आरएसएस की सदस्य बन सकती हैं?
उत्तर: नहीं, महिलाएं आरएसएस की सदस्य नहीं बन सकतीं। संघ की वेबसाइट के अनुसार, इसकी स्थापना हिंदू समाज को एकजुट करने के लिए हुई थी। कुछ व्यावहारिक कारणों से इसमें केवल हिंदू पुरुषों को ही शामिल किया गया।
जब महिलाओं के लिए भी ऐसे संगठन की जरूरत दिखी, तब वर्धा की सामाजिक कार्यकर्ता लक्ष्मीबाई केलकर ने डॉ. हेडगेवार से बात की। इसी चर्चा के बाद 1936 में राष्ट्र सेविका समिति बनी। संघ का कहना है कि दोनों संगठनों का लक्ष्य एक ही है, इसलिए महिलाएं राष्ट्र सेविका समिति से जुड़ सकती हैं।
साथ ही संघ अपने शताब्दी वर्ष में महिला समन्वय कार्यक्रमों के जरिए महिलाओं की सामाजिक भागीदारी बढ़ाना चाहता है।
प्रश्न 7: संघ के कार्यक्रमों में गणवेश (वर्दी) क्यों होता है? क्या यह स्वयंसेवक बनने के लिए अनिवार्य है? उसको कैसे प्राप्त किया जाता है?
उत्तर: गणवेश का उपयोग शारीरिक कार्यक्रमों के माध्यम से एकता और सामूहिकता का संस्कार डालने के लिए किया जाता है, परन्तु गणवेष विशेष कार्यक्रमों में ही पहना जाता है। नित्य शाखा के लिए वह अनिवार्य नहीं है। गणवेष कीउपयुक्तता ध्यान में आने पर हर स्वयंसेवक अपने खर्चे से गणवेष की पूर्ति करता है।
प्रश्न 8: आरएसएस की फंडिंग कैसे होती है? आरएसएस को पैसा कहाँ से मिलता है?
उत्तर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कोई रजिस्टर्ड संस्था नहीं है। इस कारण लोग अक्सर उस पर पारदर्शिता की कमी का आरोप लगाते हैं। आलोचक कहते हैं कि संघ इनकम टैक्स रिटर्न नहीं भरता, इसलिए उसकी फंडिंग साफ नहीं है। संघ का कहना है कि वह आत्मनिर्भर है। वह बाहर से कोई चंदा नहीं लेता, चाहे कोई अपनी मर्जी से ही क्यों न देना चाहे।
संघ के मुताबिक उसका खर्च गुरुदक्षिणा से चलता है। स्वयंसेवक साल में एक बार भगवा ध्वज को गुरु मानकर यह राशि देते हैं। इसके अलावा स्वयंसेवक कई समाज सेवा के काम करते हैं। इन कामों के लिए उन्होंने कानून के तहत ट्रस्ट बनाए हैं। ये ट्रस्ट ही समाज से मदद लेते हैं और अपना हिसाब रखते हैं।
पुराने समय में कांग्रेस ने अयोध्या की जमीन के सौदों को लेकर यह मुद्दा उठाया था। उन्होंने संघ के रजिस्टर्ड न होने और टैक्स के दायरे से बाहर रहने पर सवाल किए थे। सरसंघचालक मोहन भागवत का कहना है कि जब संघ बना तब आजाद भारत की सरकार नहीं थी। बाद में भी ऐसा कोई कानून नहीं आया जिसने हर संस्था के लिए रजिस्ट्रेशन जरूरी किया हो। उनके अनुसार संघ 'बॉडी ऑफ़ इंडिविजुअल्स' यानी व्यक्तियों का एक समूह है, इसलिए इस पर टैक्स नहीं लगता।
सरकार भले ही हिसाब न मांगे, लेकिन संघ अपनी साख के लिए हर पैसे का रिकॉर्ड रखता है। वह हर साल ऑडिट करता है। अगर सरकार कभी मांगे तो संघ के पास पूरा हिसाब तैयार है। (भविष्य का भारत - संघ का दृष्टिकोण, पेज 105)
प्रश्न 9: आरएसएस का संगठनात्मक ढाँचा क्या है?
उत्तर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में सर्वोच्च पद सरसंघचालक का है। सरसंघचालक के बाद सबसे महत्वपूर्ण पद सरकार्यवाह का है, जो संघ का मुख्य कार्यकारी अधिकारी होता है और जिसके पास संघ के रोज़ाना के मामलों पर फ़ैसला लेने की शक्तियां होती हैं। फ़िलहाल दत्तात्रेय होसबाले संघ के सरकार्यवाह हैं।
संघ की संगठनात्मक व्यवस्था में पूरे देश में 46 प्रांत, उसके बाद विभाग, ज़िले और फिर खंड हैं। संघ के मुताबिक़, 922 ज़िले, 6,597 खंड और 27,720 मंडल में 83,129 दैनिक शाखाएं हैं। हर मंडल में 12 से 15 गांव शामिल हैं।
आरएसएस कई संगठनों का समूह है, इन संगठनों को संघ का अनुषांगिक संगठन कहा जाता है, इस पूरे समूह को संघ परिवार कहा जाता है। संघ परिवार में भारतीय जनता पार्टी, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, स्वदेशी जागरण मंच, वनवासी कल्याण आश्रम, राष्ट्रीय सिख संगत, हिन्दू युवा वाहिनी, भारतीय किसान संघ और भारतीय मज़दूर संघ जैसे संगठन शामिल हैं।
प्रश्न 10: आरएसएस के अब तक कितने सरसंघचालक हुए हैं और सरसंघचालक कैसे चुना जाता है?
उत्तर: संघ में अब तक छह सरसंघचालक रहे हैं। डॉ. हेडगेवार के बाद आए पांचों सरसंघचालकों में से चार पहले सरकार्यवाह थे और एक सह-सरकार्यवाह थे। सह-सरकार्यवाह का काम संयुक्त सचिव जैसा होता है और एक समय पर संघ में कई सह-सरकार्यवाह हो सकते हैं।
संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार पहले सरसंघचालक थे। उन्होंने 1925 से 1940 तक नेतृत्व किया। हेडगेवार के निधन के बाद माधव सदाशिवराव गोलवलकर 1940 से 1973 तक इस पद पर रहे। फिर गोलवलकर के निधन के बाद 1973 में बालासाहब देवरस सरसंघचालक बने और 1994 तक रहे। खराब स्वास्थ्य के कारण देवरस ने राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया) को अपना उत्तराधिकारी बनाया। रज्जू भैया साल 2000 तक पद पर रहे। इसके बाद के एस सुदर्शन 2000 से 2009 तक सरसंघचालक रहे। उन्होंने 2009 में मोहन भागवत को चुना, जो छठे सरसंघचालक हैं।
सरसंघचालक चुनने की कोई तय प्रक्रिया नहीं है, जिसकी वजह से इसकी आलोचना भी होती है। डॉ. हेडगेवार के बाद हर सरसंघचालक की नियुक्ति उनके पिछले उत्तराधिकारी ने ही की। यह पद आजीवन होता है और वर्तमान सरसंघचालक ही अपना उत्तराधिकारी चुनता है।
मोहन भागवत का कहना है कि डॉ. हेडगेवार और गोलवलकर जैसे महान लोगों से जुड़ा यह पद श्रद्धा का विषय है। उनके अनुसार, अगला सरसंघचालक कौन होगा या वह कब तक पद पर रहेगा, यह उनकी इच्छा पर निर्भर है। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि संघ में उनका कोई वास्तविक अधिकार नहीं है। वह केवल एक मित्र और मार्गदर्शक की तरह दर्शन देते हैं। संघ का असली प्रशासनिक अधिकार सरकार्यवाह के पास होता है। सरकार्यवाह मुख्य कार्यकारी अधिकारी है और उसका चुनाव हर 3 साल में विधिवत होता है।" (भविष्य का भारत - संघ का दृष्टिकोण, पेज 105-106)
प्रश्न 11: आरएसएस पर कब-कब प्रतिबंध लगाया गया और क्यों लगे?
उत्तर: महात्मा गांधी की हत्या के बाद 1948 में आरएसएस पर पहली बार रोक लगी। 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने उनकी हत्या की थी। सरकार को लगा कि इस साजिश में संघ का हाथ था और गोडसे उसका सदस्य था। फरवरी 1948 में सरकार ने इसे सांप्रदायिक संगठन बताकर प्रतिबंधित कर दिया। सरसंघचालक गोलवलकर को भी गिरफ्तार किया गया।
अगले एक साल तक प्रतिबंध हटाने पर बातचीत चली। सरकार चाहती थी कि आरएसएस का एक लिखित संविधान हो। उसे अपनी गतिविधियां सिर्फ संस्कृति तक रखनी थीं। साथ ही, हिंसा छोड़कर भारत के संविधान और तिरंगे के प्रति वफादारी दिखानी थी। सरदार पटेल और गोलवलकर के बीच कई पत्र चले। पटेल ने लिखा कि संघ के भाषणों में जहर था, जिसका नतीजा गांधीजी की हत्या थी। खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक संघ के लोगों ने गांधीजी की मौत पर मिठाइयां बांटी थीं। 11 जुलाई 1949 को सरकार ने प्रतिबंध हटा लिया। सरकार का मानना था कि संघ अब एक लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक संगठन के रूप में काम करेगा। (द आरएसएस: ए मेनेस टू इंडिया, ए जी नूरानी, पेज 390)
आरएसएस का दावा है कि यह प्रतिबंध बिना किसी शर्त के हटा था। 14 अक्टूबर 1949 को बम्बई विधानसभा में सरकार ने भी यही कहा कि संघ ने कोई लिखित वादा नहीं किया था।(राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण, नरेंद्र ठाकुर, पेज 25)
दूसरी बार प्रतिबंध 1975 में लगा। इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाया था। 1977 में आपातकाल खत्म होते ही यह रोक भी हट गई।
तीसरी बार प्रतिबंध 1992 में बाबरी मस्जिद टूटने के बाद लगा। जून 1993 में बाहरी आयोग ने इस फैसले को गलत बताया, जिसके बाद सरकार ने प्रतिबंध हटा दिया।
प्रश्न 12: क्या संघ ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया था?
उत्तर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर अक्सर यह आरोप लगता है कि उसने ब्रिटिश शासन के खिलाफ आजादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका नहीं निभाई। आरएसएस 1925 में बना था, जब स्वतंत्रता आंदोलन काफी तेज हो चुका था। गोलवलकर के बयानों के आधार पर कहा जाता है कि संघ ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग नहीं लिया।
दूसरी ओर संघ का दावा है कि उसने आजादी की लड़ाई में पूरा योगदान दिया। सुनील आंबेकर अपनी किताब में लिखते हैं कि संघ ने 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस मनाया था। उनके अनुसार हजारों स्वयंसेवकों ने खुले तौर पर आंदोलन में हिस्सा लिया और संघ ने उन्हें समर्थन दिया। आंबेकर का कहना है कि संघ सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन का हिस्सा था।
लेखक धीरेंद्र झा ने आरएसएस पर काफी शोध किया है। उन्होंने गोलवलकर, नाथूराम गोडसे और हिंदुत्व पर किताबें लिखी हैं। झा का मानना है कि संघ के मूल सिद्धांत उसे ब्रिटिश विरोधी संघर्ष से दूर रखते थे। उनके मुताबिक संघ की हिंदुत्व विचारधारा हिंदुओं को यह समझा रही थी कि उनके असली दुश्मन मुसलमान हैं, अंग्रेज नहीं। 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन के समय संघ में अंदरूनी मतभेद थे। एक गुट आंदोलन में शामिल होना चाहता था। हेडगेवार संगठन को ब्रिटिश विरोधी रास्ते पर नहीं ले जाना चाहते थे, लेकिन वे सदस्यों के सामने कमजोर भी नहीं दिखना चाहते थे। इसलिए उन्होंने स्पष्ट किया कि संगठन हिस्सा नहीं लेगा। जो लोग जुड़ना चाहते हैं, वे व्यक्तिगत तौर पर जुड़ें। हेडगेवार ने खुद इस्तीफा दिया, एलबी परांजपे को सरसंघचालक बनाया और जंगल सत्याग्रह में शामिल होकर गिरफ्तारी दी। झा के अनुसार संघ का तर्क ब्रिटिश विरोधी नहीं था। वह हिंदू-मुस्लिम साझा आंदोलन को बांटकर केवल हिंदू हितों की बात कर रहा था।
पत्रकार नीलांजन मुखोपाध्याय ने संघ के बड़े नेताओं पर किताब लिखी है। उनका कहना है कि आरएसएस का मुख्य लक्ष्य आजादी पाना नहीं था। संघ का उद्देश्य इस्लाम और ईसाई धर्म के सामने हिंदू समाज को मजबूत और एकजुट करना था।
संघ की आलोचना इस बात पर भी होती है कि 1939 में उसने नेताजी सुभाष चंद्र बोस से मिलने से इनकार किया। बोस ने गोपाल मुकुंद हुद्दार को दूत बनाकर भेजा था, लेकिन हेडगेवार ने खराब सेहत का हवाला देकर मुलाकात नहीं की। हुद्दार ने 1979 में एक लेख में यह बात लिखी थी।
वहीं संघ के मुखपत्र द आर्गेनाइजर के एक लेख में डमरू धर पटनायक ने अलग बात कही है। उनके अनुसार 20 जून 1940 को जब नेताजी पहुंचे, तब हेडगेवार सो रहे थे। नेताजी ने उन्हें जगाने से मना कर दिया और वहां से चले गए। पटनायक लिखते हैं कि जागने पर हेडगेवार ने उन्हें ढूंढने की कोशिश की, लेकिन तब तक बोस जा चुके थे और अगले दिन हेडगेवार का निधन हो गया।
2018 में मोहन भागवत ने कहा कि डॉक्टर हेडगेवार नेताजी बोस और सावरकर से मिले थे। उन्होंने यह नहीं बताया कि यह मुलाकात कब और कहां हुई। भागवत के अनुसार हेडगेवार का क्रांतिकारियों से संबंध था और वे स्वतंत्रता आंदोलनों में शामिल हुए थे। (भविष्य का भारत-संघ का दृष्टिकोण, पेज 17 और 18)
प्रश्न 13: नाथूराम गोडसे और आरएसएस के बीच क्या सम्बन्ध था?
उत्तर: आरएसएस पर सबसे बड़ा आरोप यह है कि गांधी जी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे उसी के सदस्य थे। संघ ने हमेशा इस बात से इनकार किया है। उनका कहना है कि हत्या के समय गोडसे संघ का हिस्सा नहीं थे। इसलिए आरएसएस को इसके लिए जिम्मेदार ठहराना गलत है। कोर्ट में गोडसे ने कहा था कि वह पहले संघ में थे, लेकिन बाद में हिंदू महासभा में शामिल हो गए।
धीरेंद्र झा ने गोडसे की जीवनी पर "गाँधीज़ असैसिन: द मेकिंग ऑफ नाथूराम गोडसे एंड हिज़ आइडिया ऑफ इंडिया" किताब लिखी है। उनका कहना है कि मुख्य सवाल यह है कि गोडसे ने आरएसएस कब छोड़ा और महासभा में कब आए। रिकॉर्ड बताते हैं कि 1938 में गोडसे हैदराबाद में हिंदू महासभा के नेता थे। लेकिन नागपुर मुख्यालय से मिले कागजात दिखाते हैं कि 1939 और 1940 में वह संघ की सभाओं में मौजूद थे। उस समय कई लोग दोनों संगठनों का हिस्सा थे। 1947 में बॉम्बे पुलिस की लिस्ट में भी दोनों समूहों के लोगों के नाम एक साथ मिले। झा के मुताबिक़ गोपाल गोडसे, जो नाथूराम के भाई और इस केस में साथी थे, उन्होंने जीवन भर कहा कि नाथूराम ने आरएसएस नहीं छोड़ा था। गोडसे परिवार के अन्य सदस्यों ने भी यही कहा। उन्होंने इस बात पर नाराजगी जताई कि आरएसएस ने गोडसे से दूरी बनाई।
आरएसएस में सदस्यता का कोई औपचारिक नियम या त्यागपत्र की प्रक्रिया नहीं होती। गोडसे फांसी से पहले संघ की प्रार्थना गा रहे थे। उनके लिए यह उनकी निष्ठा का बड़ा सबूत था। मुखोपाध्याय के अनुसार, गोडसे जीवन के अंत तक संघ की विचारधारा से जुड़े रहे। भले ही वह हर कार्यक्रम में सक्रिय न हों, पर वह हमेशा एक स्वयंसेवक ही रहे।
प्रश्न 14: संघ (RSS) और BJP (भारतीय जनता पार्टी) का क्या संबंध है?
उत्तर: आरएसएस को भारतीय जनता पार्टी की रीढ़ या उसकी मूल संस्था माना जाता है। संघ के नेता कहते हैं कि वे राजनीति नहीं करते। फिर भी कई संघ सदस्य भाजपा में सक्रिय हैं। पिछले कुछ लोकसभा और विधानसभा चुनावों में संघ के कार्यकर्ताओं ने ज़मीनी स्तर पर मदद की। इसी वजह से भाजपा को चुनावी लाभ मिला और वह सरकार बना पाई। सत्ता में आने के बाद आरएसएस का प्रभाव बढ़ा है। नरेंद्र मोदी, अमित शाह, राजनाथ सिंह, शिवराज सिंह चौहान और नितिन गडकरी जैसे बड़े नेता शुरुआत से ही संघ से जुड़े रहे हैं।
2015 में इस करीबी रिश्ते की एक मिसाल मिली। दिल्ली के मध्यांचल भवन में तीन दिन तक एक बैठक हुई। इसमें मोदी सरकार के मुख्य मंत्रियों ने हिस्सा लिया और अपने काम की जानकारी दी। इनमें राजनाथ सिंह, अरुण जेटली और सुषमा स्वराज जैसे नेता शामिल थे। कहा जाता है कि संघ ने अर्थव्यवस्था और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सुझाव भी दिए। तीसरे दिन प्रधानमंत्री मोदी ने भी बैठक में हिस्सा लिया और स्वयंसेवक होने पर गर्व जताया। कुछ लोगों ने इसकी आलोचना की। उनका कहना था कि चुनी हुई सरकार का मंत्रियों का गैर-सरकारी संस्था को रिपोर्ट देना गलत है।
इस बैठक के बाद मीडिया रिपोर्ट्स में आरएसएस के सर-कार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि इसमें कुछ गुप्त नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि वे भी नागरिक हैं और मंत्रियों की बातचीत सामान्य है।
जब मोहन भागवत से पूछा गया कि भाजपा में संगठन मंत्री संघ ही क्यों देता है, तो उन्होंने कहा कि जो दल माँगता है, संघ उसे देता है। अब तक सिर्फ भाजपा ने यह माँग की है। उन्होंने यह भी कहा कि संघ की नीतियों का समर्थन करने वाले दलों को उसकी ताकत का लाभ मिलता है। संघ का मानना है कि टिकट वितरण के समय वह केवल ज़मीनी जानकारी देता है। बाकी चुनावी फैसले या रणनीति वह तय नहीं करता। (द आरएसएस रोडमैप्स फॉर द 21स्ट सेंचुरी, पेज 220)
सुनील आंबेकर कहते हैं कि भाजपा सरकार में स्वयंसेवकों के होने का मतलब यह नहीं कि संघ रोज़ के कामों में दखल देता है। संघ इस बात से इनकार करता है कि वह रिमोट कंट्रोल से सरकार चलाता है। आंबेकर के अनुसार संघ का चुनाव रैलियों या पदों के बंटवारे से कोई लेना-देना नहीं है।
प्रश्न 15: भारत के झंडे को लेकर आरएसएस विवाद में क्यों रहा?
उत्तर: आरएसएस के दूसरे प्रमुख एम.एस. गोलवलकर तिरंगे के आलोचक थे। अपनी किताब बंच ऑफ थॉट्स में उन्होंने लिखा कि यह झंडा फ्रांसीसी क्रांति के समानता, बंधुत्व और स्वतंत्रता के विचारों से प्रेरित है। उनके अनुसार कांग्रेस ने इसे केवल आकर्षण के कारण अपनाया। उन्होंने कहा कि यह झंडा हमारी राष्ट्रीय विरासत या इतिहास पर आधारित नहीं है।
संघ में भगवा झंडे को गुरु माना जाता है। मोहन भागवत के अनुसार भगवा रंग संघ की प्राचीन विरासत का प्रतीक है। उनका कहना है कि इतिहास में यह झंडा हमेशा रहा है। उन्होंने बताया कि आजाद भारत के झंडे के लिए फ्लैग कमेटी ने पहले भगवा झंडे की सिफारिश की थी। बाद में उसमें परिवर्तन हुआ, तिरंगा ध्वज आ गया, जिसका संघ पूरा सम्मान करता है। (भविष्य का भारत-संघ का दृष्टिकोण, पेज 31)
आज संघ तिरंगे का सम्मान करने की बात करता है। फिर भी आजादी के बाद कई दशकों तक उसके नजरिए पर सवाल रहे। 1930 में जब कांग्रेस ने तिरंगा फहराया, तब आरएसएस ने इसकी जगह भगवा झंडा फहराया था। डॉक्टर हेडगेवार ने 1930 में एक पत्र में शाखाओं में सिर्फ भगवा झंडा फहराने का निर्देश दिया था।
आलोचक कहते हैं कि 1950 के बाद अगले पचास साल तक संघ मुख्यालय पर तिरंगा नहीं लहराया गया। 26 जनवरी 2001 को तीन युवकों ने वहां जबरन तिरंगा फहराया। प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया की 2013 की रिपोर्ट के अनुसार, परिसर प्रभारी सुनील काठले ने उन्हें रोकने की कोशिश की थी। उन युवकों पर केस चला, लेकिन सबूत न होने से अदालत ने उन्हें बरी कर दिया।
संघ ने पहली बार 26 जनवरी 2002 को अपने मुख्यालय पर तिरंगा फहराया। समर्थकों का तर्क है कि उससे पहले निजी नागरिकों को झंडा फहराने की अनुमति नहीं थी। लेकिन इस बात का विरोध होता है। कहा जाता है कि फ्लैग कोड के नियम गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर झंडा फहराने से नहीं रोकते थे। नीलांजन मुखोपाध्याय कहते हैं कि उस समय निजी कंपनियां भी तिरंगा फहराती थीं। फ्लैग कोड का मकसद सिर्फ झंडे का अपमान रोकना था।
प्रश्न 16: क्या मुसलमान और ईसाई संघ का हिस्सा बन सकते हैं? धार्मिक अल्पसंख्यकों पर आरएसएस की क्या सोच है?
उत्तर: भारत के मुसलमान और ईसाई बाहरी नहीं हैं। वे यहीं के निवासी हैं और हम सबके पूर्वज एक ही हैं। संघ के लिए हिंदू शब्द एक जीवन जीने का तरीका है। धर्म बदलने से यह नजरिया नहीं बदलता। इस आधार पर वे संघ में शामिल हो सकते हैं। कई लोग पहले से ही जिम्मेदारी निभा रहे हैं। उन्हें धर्म के आधार पर कोई विशेष सुविधा या भेदभाव नहीं मिलता। वे सभी कार्यक्रमों में बराबर के भागीदार होते हैं।
आरएसएस का काम मुख्य रूप से हिंदू संस्कृति पर रहा है। इसी कारण अल्पसंख्यकों के प्रति उनके नजरिए पर सवाल उठते हैं। दूसरे सरसंघचालक एम एस गोलवलकर की किताब बंच ऑफ थॉट्स में इस पर विचार मिलते हैं। उन्होंने लिखा था कि बहुत कम मुसलमान और ईसाई हमलावरों के रूप में आए थे। बाकी लोग धर्मांतरण से बढ़े। गोलवलकर ने मुसलमानों, ईसाइयों और कम्युनिस्टों को देश का आंतरिक शत्रु कहा था।
2018 में मोहन भागवत से इस बारे में पूछा गया। उन्होंने कहा कि बातें किसी खास समय और हालात में कही जाती हैं। वे हमेशा के लिए सच नहीं होतीं। अब किताब के नए संस्करण से आंतरिक शत्रु वाला हिस्सा हटा दिया गया है। भागवत के अनुसार संघ कोई बंद संगठन नहीं है। समय के साथ सोचने का तरीका बदलता है और डॉक्टर हेडगेवार ने इसकी अनुमति दी है। (भविष्य का भारत-संघ का दृष्टिकोण, पेज 90)
जुलाई 2021 में भागवत ने कहा कि विज्ञान भी हमारे समान पूर्वजों की पुष्टि करता है। चालीस हजार साल पहले हम सबका डीएनए एक था। अगर कोई हिंदू कहता है कि मुसलमान यहां नहीं रहना चाहिए, तो वह खुद हिंदू नहीं रहेगा। मोहन भागवत कई बार कह चुके हैं कि जो भारत को अपना घर मानता है, वह हिंदू है। साथ ही, उन्होंने भारत को हिंदू राष्ट्र भी बताया है।
प्रश्न 17: क्या सरकारी कर्मचारी आरएसएस के सदस्य बन सकते हैं?
उत्तर: 1966 में गृह मंत्रालय ने आदेश दिया था कि सरकारी कर्मचारी किसी राजनीतिक दल या संगठन से नहीं जुड़ सकते। वे किसी राजनीतिक आंदोलन में भाग नहीं ले सकते थे और न ही चंदा दे सकते थे। उस समय आरएसएस और जमात-ए-इस्लामी से जुड़ाव पर सिविल सर्विस नियमों के तहत कार्रवाई का प्रावधान था। यही बात 1970 और 1980 के आदेशों में भी कही गई थी।
जुलाई 2024 में डिपार्टमेंट ऑफ़ पर्सोनेल एंड ट्रेनिंग (डीओपीटी) ने एक नया सर्कुलर जारी किया। पुराने निर्देशों की समीक्षा के बाद सरकार ने उन आदेशों से आरएसएस का नाम हटा दिया है।
अब कोई भी सरकारी कर्मचारी बिना किसी रोक के आरएसएस से जुड़ सकता है या उसके लिए काम कर सकता है।