शाखा पुस्तिका
आरएसएस की शाखा में प्रयोग होने के लिए एक पुस्तिका बनती है। यह एक माह, दो माह, तीन माह, ऐसे कोई भी आवृत्ति की हो सकती है। यह पुस्तिका, शाखा का एक मैनुअल है, एक दर्शन है। उसमें क्या होगा? शारीरिक कार्यक्रम क्या होंगे? बौद्धिक कार्यक्रम क्या होंगे? नित्य शाखा पर खेल कूद क्या होगा? उस माह भर में क्या कार्यक्रम होंगे। उसकी एक पूरी कार्य योजना और उस शाखा के पोषण के लिए एक पुस्तिका छपती है। इसके अनुसार संघ शाखा को और संगठन को चलाया जाता है। इसको बनाने में बड़ा परिश्रम किया जाता है। उस पुस्तिका का जो मुद्रण कार्य वह संगठन की ओर से होता है। वह राशि अपने स्वयं संगठन के लिए चलाई जाने वाली राशि यानी श्री गुरुदक्षिता की राशि में से खर्च करके इस पुस्तिका को छापता है। पहले इस पुस्तिका का नाम बौद्धिक पुस्तिका हुआ करता था। लेकिन फिर लोगों को ध्यान में आया कि इसमें केवल बौद्धिक कार्यक्रम नहीं है। शाखा के शारीरिक कार्यक्रम भी है। तो इसका नाम परिवर्तित कर शाखा पुस्तिका नाम दिया।
शाखा पुस्तिका का महत्व
- ऐसी एक उपयोगी पुस्तिका को छाप कर प्रत्येक संघस्थान पर उसके ऊपर अधिकारियों तक पहुंचाया जाता है।
- यह पुस्तिका सामान्य एक शाखा के लिए यानी एक मुख्य शिक्षक के लिए अपरिहार्य होती है। मुख्य शिक्षक तक यह पुस्तिका जाती है। इसके नीचे अगर कहीं प्रचुरता रही तो भले पहुंचे, लेकिन विधान यही है।
- एक शाखा पर वह प्रतिदिन संघस्थान पर पहुंचे। उसके आधार पर कार्यक्रम किए जाए, लिए जाए इसकी योजना होती है।
- बौद्धिक विभाग के बौद्धिक प्रमुख और टोली के सहयोग से इस शाखा पुस्तिका का निर्माण अपने अधिकारियों के बताए अनुसार करते है। उसके सामग्री, पांडुलिपि तैयार करने से लेकर मुद्रण और वितरण तक के कार्य को करते है।
- इसकी भाषा कोई हो सकती है। जरूरी नहीं कि हिंदी में ही छपे। यानी जिस अंचल के लिए प्रयुक्त होने वाली है वहां की भाषा का प्रयोग किया जा सकता है। इसमें हिंदी है, संस्कृत है, तेलुगु, तमिल ऐसी देश भाषाएं हैं। इन सब का प्रयोग हो सकता है।
- पृष्ठ संख्या कोई 100 के नीचे ही होती है क्योंकि बहुत विस्तार देना इसका उद्देश्य नहीं है लेकिन इसके जो स्थाई स्तंभ है वो इसमें शामिल हो।
शाखा पुस्तिका की सामग्री
- जो सबसे पहला पृष्ठ है उस पर उन तीन महीनों में जिसके लिए वो पुस्तिका छापने वाली है उसमें कोई एक बड़ा पर्व है कोई उद्देश्य है उससे संबंधित एक सुंदर चित्र उस पर छापा जाता है। ऊपर उसका कुछ विवरण दे दिया कि शाखा पुस्तिका अमुक प्रांत या अमुक विभाग या इस माह से लेकर इस माह तक यह किसके लिए ये सब छाप करके और पहले पृष्ठ को सजा दिया जाता है। उसका पूरा विवरण ये पहला पृष्ठ होता है।
- इसके बाद आगे पीछे क्रम हो सकता है। पहले क्या बाद में क्या ऐसा कोई भेद नहीं है।
- उसके बाद ये अपेक्षा होती कि तीन माह के लिए ये पुस्तिका है। तो माह के स्मरणीय दिवस होने चाहिए। जिसमे महापुरुषों की जयंती, बलिदान दिवस, महत्वपूर्ण त्यौहार एवं उतसव आदि होते है।
- लेकिन इसके बाद तीन अमृत वचन, ये अमृत वचन तीन तीन माह के लिए होते है। लेकिन इन तीन के अलावा चौथा, पांचवा, छठा ये कई बार आयु यानी बालों के लिए, तरुणों के लिए ऐसे इस आधार पर भी कुछ अतिरिक्त सुभाषित या सूक्तियां दी जाती है। ये सूक्तियां संस्कृत में ही हो कोई आवश्यक नहीं। इसके लिए आप संत कवियों के दोहे उनकी कविताएं उनकी कुछ पंक्तियां जो प्रेरक होती है ।
- फिर तीन बोध कथाएं या प्रेरक प्रसंग दोनों मिला दिया। प्रेरक प्रसंग, बोध कथाएं और बड़ी कहानी इसका एक स्तंभ होता। इसमें छोटी कहानियां उपनिषदों की, वेदों की, बलिदान की, हमारे देश के खिलाड़ी की, हमारे देश के महान वैज्ञानिक की, ऐसी कहानियों का चयन भी होना चाहिए।
- इसी प्रकार तीन चर्चा के स्तंभ होते हैं। जिसमें उस विषय पर स्वयंसेवक बैठकर के चर्चा करते। ग्रुप डिस्कशन करते। ये चर्चा का समाचार समीक्षा जो विषय समाज में चल रहा है देश में चल रहा है उस पर हमारा क्या पक्ष हो हमारा क्या रोल हो इस विषय को लेकर के चर्चा करते हैं।
- फिर इसी क्रम में तीन बौद्धिक, वे बौद्धिक हमारे पूर्व के हो सकते हैं, वर्तमान के हो सकते हैं लेकिन सामान्यत वो बौद्धिक पहले हो चुके होते हैं, उसी विचार बिंदु को तैयार नवनीत कर दिया जाता है।
- दो तीन माह में कोई उत्सव है, उसकी तैयारी कैसे करेंगे, व्यवस्था कैसे करेंगे, क्या कार्य करना आदि होता है।
- इसके बाद कुछ आयामों की जानकारी जैसे सेवा विभाग, इसी प्रकार से कुछ अन्य जो हमारे संघ के अनुसंगिक क्षेत्र हैं उनकी जानकारी होती है ।
- फिर इसी प्रकार तीन गीत होने चाहिए। तीन गणगीत यानी जिसको स्वर सहित शाखा पर यानी कोई दोहराएगा । लोगों को याद हो जाए ऐसे तीन गण गीत तीन पृष्ठों पर सजाकर क्रम के बाद रख दिए गए।
- अब अंत में तीन स्तंभ दिए जाते है जिसमें संख्या नोट करने का, विषय तथा पहली से लेकर 31 तक या 30 तक तारीख होती है । उन तारीखों में संघस्थान पर क्या उपस्थिति रही, उस उपस्थिति का एक वृत्त होता है । उसको मुख्य शिक्षक भर कर उसका वृत्त बाद में अपने केंद्र मुख्यालय चाहे वो संलय है वहां उसको प्रेषित कर देता है ।
कुछ मिलाकर उस एक पुस्तिका में कुछ भी ऐसा जो तीन माह में संघस्थान पर होना है वो सब कुछ उसमें देने का प्रयत्न रहता है। एक स्वयंसेवक जो संघस्थान पर क्या करे? कई बार उसके सामने असमंजस रहता है उसके लिए ये शाखा पुस्तिका एक मैनुअल का काम करती है। इससे काम बहुत आसान हो जाता है। हम भी इस पुस्तिका के महत्व को समझे और यह पुस्तिका मिल गई है तो हमें केवल इसको पढ़कर छोड़ना नहीं है बल्कि उसको संघस्थान पर प्रयोग करना है और इस कीमत को समझना कि यह संघ के स्वयंसेवकों के समर्पण की राशि श्री गुण दक्षिणा से छपी पुस्तिका का सार्थक उपयोग हो।