सामाजिक समरसता
- सभी को इस बात की सावधानी बरतनी चाहिए कि भूतकाल के झगडों को वर्तमान में घसीटकर अपने भविष्य को कोई संकट में न डाल दे। हम सभी इस समाज के अंग हैं।
- जिस प्रकार प्रभु श्रीराम ने राक्षसों के संहार हेतु वनवासी, वानर, रीछ सभी का सहारा लिया, उन्हें संगठित किया, ठीक उसी प्रकार आज समाज में छोटे-छोटे कार्यक्रम (जैसे सामूहिक सद्भावना यज्ञ, सामूहिक सुंदरकाण्ड आदि) के द्वारा सामाजिक समरसता को प्रबलता प्रदान करें।
- समरस समाज द्वारा ही अंतिम व्यक्ति का उत्थान होगा तथा देश का वास्तविक कल्याण होगा।
- भाग्य विधाता हिन्दू समाज :- हमारे विवधतापूर्ण समाज को संगठित कर सकने वाला सूत्र कौन सा है ? वह है - 1. सब विविधताओं को स्वीकार व उनका सम्मान करने वाली हमारी सनातन संस्कृति- हिन्दू संस्कृति है। वही सब भारतीयों का स्वभाव, उनकी मूक परंपरा है। 2. उस संस्कृति के आचरण को ही हमारे जिन महापुरुषों ने अपना जीवन लक्ष्य बनाया, उसके पोषण- संवर्द्धन के लिए अथक परिश्रम किया।
- समरसता का वातावरण :- अस्पृश्यता झेल रहे बन्धुओं ने बहुत अत्याचार व कष्ट सहन किये हैं किन्तु उन्हें भी यह ध्यान रखना चाहिए ।
- कि समाज के सभी घटक यह अनुभव करते हैं कि यह बात अनुचित है और ये अत्याचार रुकने चाहिए। इस दिशा में वे प्रयत्नशील हैं। उन्हें (अस्पृश्यता सह रहे बंधुओं को) भी अभिप्रेत है कि अन्याय समाप्त होकर, उन्हें सबके साथ समानता का स्थान प्राप्त हो। सभी लोगों का इस दिशा में प्रयास होना चाहिए। संघ का सामाजिक मूल्यांकन हो न कि राजनितिक ।
- हमारे महापुरुष, देवी-देवता साझी विरासत हे, किसी धर्म विशेष के नहीं है।
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