सेवा गीत

सेवा गीत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का प्रेरणादायक सेवा गीत - यह गीत समाजसेवा, समर्पण और समरसता की भावना को जागृत करता है। और समाज सेवा, राष्ट्र प्रेम और मानवीय मूल्यों को समर्पित होते हैं।


यहां कुछ प्रसिद्ध सेवा और प्रेरणादायक संघ गीत हैं:


1. सेवाव्रत ले अन्तर्मन में, सधे कदम बढ़ते जाएं।

सेवाव्रत ले अन्तर्मन में, सधे कदम बढ़ते जाएं।
हर आंगन में सुखद, सुमंगल, समरस जीवन सरसाएं ।।

द्वारे द्वारे शिक्षा पहुँचे, हरेक में कौशल्य निखार ।
सब जन को हो पूरे अवसर, सब जाने निज के अधिकार ।। नयी-नयी हो रचनाएँ ।।

सबका सुन्दर श्रेष्ठ सुपोषण, स्वस्थ, निरोगी हो जन-जन
सदा उर्वरा धरती माता, पवित्र जल और मुक्त गगन ।। स्वच्छ पवन नित लहराए ।।

सदा सिद्ध और सुगठित रहना, प्रेम भरा सबका सम्मान ।
कैसे भी संकट आ जाए, यत्न करें हो सबका त्राण ।। अपना पौरूष प्रकटाएँ ।।

स्वाभिमान से करे गर्जना, सभी दिशा में नव उत्थान ।
स्वावलम्बी बन करें परिश्रम, सागर मंथन अमृत पान ।। समर्थ भारत विकसायें ।।


2. दीन दुखी की सेवा करना, निश्चित कर्म हमारा है॥

हम सेवक हैं मानवता के, सेवा धर्म हमारा है।
दीन दुखी की सेवा करना, निश्चित कर्म हमारा है॥ ध्रुव ॥

जिसने सेवा धर्म निभाया, नर में नारायण देखा,
वही महामानव देखेगा, हर मानव में प्रभु रेखा,
एक ब्रह्म है पिता सभी का, निर्मित यह जग सारा है ॥ 1 ॥ दीन दुखी की......

सभी सुखी हों सभी निरोगी, सब को सुविधा एक मिले,
नीति नियम से बंधे सभी हों, पर स्वतंत्र प्रत्येक मिले,
अनिल-अनल-भू-नभ जल सब पर, शुचि अधिकार हमारा है ॥ 2 ॥ दीन दुखी की......

सबको मिले जीविका जग में, भूखा सोए जीव नहीं,
सभी करें श्रम साहस संयम, अपनाएं तरकीब यही,
सब समान हों सब महान हों, यह हमने स्वीकारा है ॥3 ॥ दीन दुखी की......

शिक्षा की सुविधा हो सबको, सभी एक हों भेद न हो,
अपना-अपना कर्म करें सब, पछतावा या खेद न हो,
स्वस्थ सुखी सानंद रहें सब, यह अभियान हमारा है ॥ 4 ॥ दीन दुखी की......

अबला बाल वृध्द रोगी को मिले सहारा हम सबका,
निर्बल निरीह और निर्धन को हो न कहीं कोई खटका,
जो सेवा को धर्म मानता, वह ईश्वर का प्यारा है॥15 ॥ दीन दुखी की......


3.सेवा है यज्ञकुन्ड सिमधा सम हम जलें

सेवा है यज्ञकुन्ड सिमधा सम हम जलें
ध्येय महासागर में सरित रूप हम मिलें।
लोक योगक्षेम ही राष्ट्र अभय गान है
सेवारत व्यक्तिी व्यक्तिी कार्य का ही प्राण है ॥धृ॥
सेवा है यज्ञकुन्ड सिमा सम हम जले.......

उच्च नीच भेद भूल एक हम सभी रहें
सहज बन्धूभाव हो राग-द्वेष ना रहे
सर्वदिक प्रकाश हो शानदीप बाल दो
चरण शीघ्र द्रुढ बढे ध्येय शिखर हम चढे ॥१॥
सेवा है यज्ञकुन्ड सिमधा सम हम जले.......

मुस्कुराते खिल उठे मुकुल पात पात में
लहर लहर सम उठे हर प्रघात घात में
स्तुति निन्दा लाभ लोभ यश विरक्ती छाँव से 
कर्मक्षेत्र मे चले सहज स्नेह भाव से ॥२॥
सेवा है यज्ञकुन्ड सिमधा सम हम जल ....... 

दीनहीन सेवा ही परमेष्टी अर्चना 
केवल उपदेश नही कर्मरूप साधना
मन वाचा कर्म से सदैव एक रूप हो
शिवसुन्दर नव समाज विश्ववन्द्य हम गढे ॥३॥
सेवा है यज्ञकुन्ड सिमधा सम हम जले.......


4. समाज है आराध्य हमारा, सेवा है आराधना।

समाज है आराध्य हमारा, सेवा है आराधना।
भारत माता के वैभव की सेवा व्रत से साधना ॥ धृ॥

हम सब भारत माता के सुत, आपस में भाई-भाई ।
भ्रम, अज्ञान, स्वार्थ के कारण, भेदभाव की है यह खाई ।
सेवा व्रत से आज हमें है, इस खाई को पाटना।।
समाज है आराध्य हमारा....॥1॥

समाज से ही संस्कृति की यह श्रेष्ठ धरोहर हमें मिली।
धन, सामर्थ्य, ज्ञान की पूंजी, समाज से ही हमें मिली।
यह समाज ऋण पूर्ण चुकाने जो पाया सो बांटना ।।
समाज है आराध्य हमारा .... ॥2॥

समान अवसर मिले सभी को कोई भी न उपेिक्षत हो।
सभी स्वस्थ, शिक्षत, संस्कारत, समर्थ और सुरिक्षत हो।
दया नहीं, उपकार नहीं यह, अपनेपन की भावना ॥
समाज है आराध्य हमारा .... ॥3॥

भाषा, पंथ, जिात जो भी हो, अपने तो हैं बन्धु सभी।
ग्राम-नगर-वनवासी, गिरजन, भारत माँ के पुत्र सभी।
पुत्रों के सुख में ही तो है, माँ के सुख की धारणा ।
समाज है आराध्य हमारा .... ॥ 4 ॥


5. हम सेवक हैं मानवता के, सेवा धर्म हमारा है। 

हम सेवक हैं मानवता के, सेवा धर्म हमारा है। 
दीन दुखी की सेवा करना, निश्चित कर्म हमारा है॥ ध्रुव ॥ 

जिसने सेवा धर्म निभाया, नर में नारायण देखा,
वही महामानव देखेगा, हर मानव में प्रभु रेखा, 
एक ब्रह्म है पिता सभी का, निर्मित यह जग सारा है || 1 || दीन दुखी की......

सभी सुखी हों सभी निरोगी, सब को सुविधा एक मिले, 
नीति नियम से बंधे सभी हों, पर स्वतंत्र प्रत्येक मिले, 
अनिल-अनल-भू-नभ जल सब पर, शुचि अधिकार हमारा है ॥ 2 ॥ दीन दुखी की ......

सबको मिले जीविका जग में, भूखा सोए जीव नहीं, 
सभी करें श्रम साहस संयम, अपनाएं तरकीब यही,
सब समान हों सब महान हों, यह हमने स्वीकारा है ॥3 ॥ दीन दुखी की......

शिक्षा की सुविधा हो सबको, सभी एक हों भेद न हो, 
अपना-अपना कर्म करें सब, पछतावा या खेद न हो,
स्वस्थ सुखी सानंद रहें सब, यह अभियान हमारा है॥4॥ दीन दुखी की......

अबला बाल वृध्द रोगी को मिले सहारा हम सबका, 
निर्बल निरीह और निर्धन को हो न कहीं कोई खटका,
जो सेवा को धर्म मानता, वह ईश्वर का प्यारा है॥15 ॥ दीन दुखी की......



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