सेवा सुभाषित
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की विचारधारा और कार्यों में 'सेवा' और 'सुभाषित' (प्रेरणादायक श्लोक) का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। ये सुभाषित समाज सेवा, निस्वार्थ भाव और बंधुत्व की भावना सिखाते हैं। सेवा और परोपकार से जुड़े संस्कृत सुभाषित (सुंदर वचन) मनुष्य को श्रेष्ठ आचरण और निःस्वार्थ सेवा की प्रेरणा देते हैं। सेवा के महत्व को दर्शाने वाले प्रमुख श्लोक और उनके अर्थ नीचे दिए गए :-
1.
न त्वहं कामये राज्यं, न स्वर्ग ना पुनर्भवम् ।
कामये दुःख तप्तानाम्, प्राणी नामार्त नाशनम् ।।
कामये दुःख तप्तानाम्, प्राणी नामार्त नाशनम् ।।
भावार्थ: मैं राज्य की कामना नहीं करता, मुझे स्वर्ग और मोक्ष नहीं चाहिए । दुःख से पीड़ित प्राणियों के दुःख दूर करने में सहायक हो सकूँ । यही मेरी कामना है।
2.
तन पवित्र सेवा किए, धन पवित्र कर दान।
मन पवित्र हरि भजन कर, होत त्रिविध कल्याण ॥
मन पवित्र हरि भजन कर, होत त्रिविध कल्याण ॥
भावार्थ : शरीर की पवित्रता सेवा से धन की पवित्रता दान से, मन की पवित्रता हरि भजन से होती है। इन तीनों प्रकार से कल्याण होता है।
3.
अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनं द्वयम् ।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥
भावार्थ :- भगवान वेदव्यास ने अठारह पुराणों का सार दो वचनों में इस प्रकार बतायाः "परोपकार सबसे बड़ा पुण्य है और दूसरों को पीड़ा देना सबसे बड़ा पाप है।
4.
उपकाराः परोधर्मः प्रयत्नो दैवतं परम् ।
सुशीलता परा नितः, कार्य संघात्मकं परम् ॥
सुशीलता परा नितः, कार्य संघात्मकं परम् ॥
भावार्थ : - उपकार सबसे बड़ा धर्म है, प्रयत्न सबसे बड़ा माग्य है, सुशीलता सबसे बड़ी निति और संगठन का कार्य सबसे बड़ा कार्य है ।
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